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🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ विश्वास का अंग १९ - १०/१३)
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*दादू उद्यम औगुण को नहीं, जे कर जाणै कोइ ।*
*उद्यम में आनन्द है, जे सांई सेती होइ ॥१०॥*
कोई शंका करता है कि क्या योगक्षेम(आजीविका) के लिये उद्योग करने में कोई दोष है ? इसका समाधान करते हुए श्रीदादूजी महाराज कह रहे हैं कि “उद्योग औगुण को नहीं ।”
गीता में लिखा है- जो पुरुष परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति त्यागकर कर्म करता है, वह जल में कमल के पत्ते की तरह पाप में लिप्त नहीं होता ।
अर्थात् उद्योग करने में कोई दोष नहीं है, यदि वह उद्योग प्रभु प्राप्ति के लिये किया गया हो तो, तब ही उसमें आनन्द प्राप्त होता है । केवल योगक्षेम के लिये किया गया उद्योग है तो वह श्रममात्र ही है । क्योंकि भक्तों का योगक्षेम तो भगवान् अपने आप ही कर रहे हैं । फिर भक्त को योगक्षेम के लिये उद्योग की क्या आवश्यकता है ?
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*दादू पूरणहारा पूरसी, जो चित रहसी ठाम ।*
*अन्तर तैं हरि उमग सी, सकल निरंतर राम ॥११॥*
यदि भक्त का चित्त विश्वासपूर्वक भगवान् के चिन्तन में डूबा रहे तो भगवान् उसके वश में होकर उसके योगक्षेम के लिये स्वयं प्रयत्न करने लगते हैं, क्योंकि वह तो सब को पूरने वाला है तो फिर भक्त को क्यों नहीं देंगे, उसको तो सबसे पहले देंगे । निरन्तर भगवान् का चिन्तन करने से भक्त के हृदय में ज्ञान भी हो जायेगा, जिससे भक्त को सब जगह पर भगवान् ही दीखने लगेंगे ।
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*पूरक पूरा पास है, नाहीं दूर, गँवार ।*
*सब जानत हैं, बावरे ! देबे को हुसियार ॥१२॥*
भक्तों की कामना को पूर्ण करने वाले तथा पालन करने वाले भगवान् सर्वव्यापक होने से भक्त के समीप ही सदा रहते हैं । कभी दूर नहीं जाते और वह भगवान् सर्वज्ञ है, अतः भक्त की मन की इच्छा को भी जानते हैं और देने में भी सर्वसमर्थ हैं । क्योंकि भगवान् तो भक्त को अपनी आत्मा तक दे देते हैं, तो फिर योगक्षेम के विषय में तो बात ही क्या है ? अतः साधक को विश्वासपूर्वक भगवान् को भजना चाहिये ।
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*दादू चिन्ता राम को, समर्थ सब जाणै ।*
*दादू राम संभाल ले, चिंता जनि आणै ॥१३॥*
परमात्मा सर्वसमर्थ सर्वज्ञ हैं । अतः भक्त की सब प्रकार की चिन्ता भगवान् को है । भक्त को चाहिये कि सर्वचिन्ताओं से निर्मुक्त होकर प्रभु का ही चिन्तन करे, योगक्षेमादिक का नहीं ।
वल्लभाचार्यजी लिख रहे हैं- “भगवान् श्रीकृष्ण को सर्वदा हर प्रकार से भजना चाहिये, क्योंकि भक्त का यही धर्म हैं और कोई नहीं । प्रभु सर्वसमर्थ हैं, वह स्वयं ही मेरा कार्य करेंगे, ऐसा विचार कर भक्त को निश्चिन्त हो जाना चाहिये ।”
(क्रमशः)

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