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🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ विचार का अंग ३०/३४)
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*खड्ग धार विष ना मरै, कोइ गुण व्यापै नांहि ।*
*राम रहै त्यों जन रहै, काल झाल जल मांहि ॥३०॥*
ब्रह्मवेत्ता जीवन्मुक्त ज्ञानी पुरुष न शस्त्रों से काटा जाता, न वह काल से डरता, न विष से मरता, न आसुरी गुणों से व्यथित होता, किन्तु ब्रह्म की तरह निर्विकार रहता है ।
गीता में लिखा है- “इस आत्मा को कोई भी पार्थिव अस्त्र-शस्त्र काट नहीं सकते । पानी भी उसको गला नहीं सकता, वायु द्वारा उसका शोषण नहीं हो सकता ।”
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*॥ विचार ॥*
*सहज विचार सुख में रहै, दादू बड़ा विवेक ।*
*मन इन्द्रिय पसरै नहीं, अंतर राखै एक ॥३१॥*
वह भी विवेकी मनुष्य माना गया है, जिसका मन और इन्द्रियों के विषयों में आसक्त नहीं होता, किन्तु ब्रह्मविचार द्वारा जिसका चित्त अन्तरात्मा में लीन रहता है । अतः साधक को ब्रह्मविचार करना चाहिये ।
वासिष्ठ में लिखा है- “विचाररूपी नेत्र जिसको प्राप्त हो गये हैं, वह अन्धकार में भी नष्ट नहीं होता, किन्तु नेत्रवाला तो अन्धकार में न दीखने के कारण अपने को नष्ट की तरह ही मानता है तथा उग्र तेजस्वी सूर्य की तरफ देखने पर भी उसकी ज्योति नष्ट नहीं होती और व्यवहित पदार्थों को भी देख लेता है । यह विचार का चमत्कार आदरणीय और परमानन्द की प्राप्ति का साधन है । अतः इस विचार को एक क्षण के लिये भी मत त्यागो । जो विवेक से रहित है, वह जन्मान्ध की तरह शोचनीय और दुर्बुद्धिवाला है । जिसको विवेक विचार अपनी आत्मा की तरह प्रिय है, वह दिव्य चक्षुवाला महात्मा आपत्तियों को जीतकर परमार्थ को प्राप्त हो जाता है ।”
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*मन इन्द्रिय पसरै नहीं, अहनिशि एकै ध्यान ।*
*पर उपकारी प्राणिया, दादू उत्तम ज्ञान ॥३२॥*
वह ही उत्तम ज्ञान कहलाता है जिससे मन और इन्द्रियों को वश में किया जा सके । जिससे निरन्तर एक ब्रह्म का ही चिन्तन होने लगे और उस उत्तम ज्ञान के द्वारा उपदेश करके दूसरे प्राणियों के अज्ञान को नष्ट कर के उनका भला किया जाय ।
योगवासिष्ठ में- “कीचड़ में फंसकर उसके साथ मिल जाना अच्छा है और मलमूत्र का कीड़ा बनकर मलमूत्र में रहना भी अच्छा हो सकता है, लेकिन मनुष्य होकर विचारहीन जीवन अच्छा नहीं । विचारहीनता सब अनर्थों की खान है । ऐसा अविवेकी पुरुष सब साधुओं से तिरस्कृत है, क्योंकि वह संपूर्ण दोषों की सीमा है । अतः ऐसी अविचारता को त्याग देना चाहिये, किन्तु महात्माओं के साथ नित्य ही आत्मा अनात्मा का विचार करते रहना चाहिये, क्योंकि आत्मा अनात्मा का विचार ही अन्ध कूप में न गिरने देने का एकमात्र उपाय है ।”
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दादू आपा उरझे उरझिया, दीसे सब संसार ।
आपा सुरझे सुरझिया, यहु गुरु ज्ञान विचार ॥३३॥
दादू मैं नाहीं तब नाम क्या, कहा कहावै आप ?
साधो ! कहो विचार कर, मेटहु तन की ताप ॥३४॥
व्यष्टि अहंकार वाले प्राणियों के ही नामकरण संस्कार किये जाते हैं व्यवहार के लिये । परन्तु जो महात्मा व्यवहारातीत हैं तथा अहंकाररहित है उनके नाम आदि कुछ भी नहीं है, क्योंकि वे तो आत्मस्वरूप हो गये और आत्मा का कोई नाम नहीं होता, वह नामरूप रहित है । अतः अद्वैत ब्रह्म का विचार करके त्रिविध तापों का नाश करके सुखी हो जाओ ।
(क्रमशः)

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