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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*७. हैरान कौ अंग ~ २९/३२*
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करता सब मंहि एक है, एक करै सो होइ ।
कहि जगजीवन एक बिन, दूजा नांहीं कोइ ॥२९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि एक प्रभु जो सब में है वो एक जो करते हैं वह ही होता है उनके बिना कोइ कर्ता नहीं है ।
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एक पिछांणै एक भजि, दुइ माँहि देखै एक ।
कहि जगजीवन एक करि, उपजै सकति१ अनेक ॥३०॥
{१. सकति - शक्ति(=सामर्थ्य)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि एक को जान कर एक का स्मरण ही करें जीव व ब्रहम को भी एक ही देखें उन एक में ही अनेक करने की सामर्थ्य है ।
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परम तेज सोइ एक है, परम नूर सोइ एक ।
कहि जगजीवन परम जोति, हरि की कला अनेक ॥३१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो परम तेज है वह एक ही है परम नूर भी एक ही है । परम ज्योति भी एक परमात्मा की ही है वे सब कुछ एक होते हुऐ भी अनेक कलाओं के विज्ञ है ।
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देह नहीं तहां जीव नहिं, अंस नहीं तहां आस ।
अनंत तेज मंहि तेज है, सो कहि जगजीवनदास ॥३२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि देह नहीं होने पर जीव भी पलायन करता है । जहाँ कुछ अंश मात्र भी नहीं होता फिर भी प्रभु कृपा की आस बनी रहती है । उनका तेज अनेक रुपों में भासित होता है ।
(क्रमशः)

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