सोमवार, 21 सितंबर 2020

विश्‍वास का अंग १९ - १४/१७


🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ विश्‍वास का अंग १९ - १४/१७)
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*दादू चिन्ता कियां कुछ नहीं, चिंता जीव को खाइ ।*
*होना था सो ह्वै रह्या, जाना है सो जाइ ॥१४॥*
जो होने वाला है, वह अवश्य होकर रहेगा । जो नष्ट होने वाली वस्तु है, वह अवश्य नष्ट होगी । अतः इन विषयों में हमारे विचार से कोई परिवर्तन भी नहीं होने वाला है । चिन्ता से तो केवल दुःख ही बढ़ेगा । अतः चिन्ता से निर्मुक्त होकर हरिभजन ही भक्त को करना चाहिये ।
स्कन्दपुराण में लिखा है कि- “चिंता करने से ज्ञान, बल, बुद्धि नष्ट हो जाते हैं । अतः चिन्ता को त्यागो, चिता और चिन्ता दोनों समान है । फिर भी चिता से चिन्ता अधिक मानी गई हैं क्योंकि चिता तो निर्जीव को जलाती है और चिन्ता जीते हुए को ही जला डालती है ।
यह चिन्ता मनुष्यों के लिए एक महान् ज्वर है, क्योंकि चिन्ता करने से भूख, निद्रा, बल, रूप, उत्साह और बुद्धि तथा जीवन भी नष्ट हो जाता है ज्वर तो छः दिन बीतने के बाद पुराना हो जाता है, किन्तु चिन्तारूपी ज्वर तो प्रतिदिन तीव्र होता हुआ नूतन-नूतन होता रहता है ।”
महाभारत में- “हे राजन् ! मरे हुए का शोक करने वाला उसके साथ तो नहीं जा सकता और न उसके साथ मर ही जाता । जीना मरना तो जीव का स्वाभाविक धर्म है । अतः उसके लिये शोक करना अनुचित है । शोक करने से धन भी नहीं मिलता और कोई अन्य चिन्ता का फल भी नहीं बतलाया । चिन्ता करने वाला तो अपने कपड़े में स्वयं उत्पन्न की गई आग को लपेट कर जलता रहता है । अतः वह पण्डित नहीं कहा जा सकता ।”
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*॥ पोष प्रतिपालरक्षक ॥*
*दादू जिन पहुँचाया प्राण को, उदर उर्ध्व मुख खीर ।*
*जठर अग्नि में राखिया, कोमल काया शरीर ॥१५॥*
जिस परमात्मा ने गर्भवास में जब बच्चे का मुख ऊपर था, तब प्रभु ने उसे पोषण रस देकर बच्चे का पालन किया तथा उसके कोमल शरीर को जठराग्नि से बचाया । गर्भ से बाहर आने पर भी माता के स्तनों में दूध पैदा करके उसका पालन किया । इस तरह उसके गुणों को बार-बार याद करके विश्वासपूर्वक उसका भजन करना चाहिये ॥
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*दादू समर्थ संगी संग रहै, विकट घाट घट भीर ।*
*सो सांई सूं गहगही, जनि भूलै मन बीर ॥१६॥*
वह परमात्मा सर्वसमर्थ है, सदा जीव का साथी है । गर्भवास में जठराग्नि से जलते हुए जीव के शरीर को उसने ही बचाया । अतः हे मन ! तू मायिक जाल में पड़कर उस परमात्मा को मत भूल, प्रत्युत प्रेमप्रीति से उसका भजन कर ।
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*गोविन्द के गुण चिंत कर, नैन, बैन, पग, शीश ।*
*जिन मुख दिया कान, कर प्राणनाथ जगदीश ॥१७॥*
जिस प्राणनाथ जगदीश्वर ने जीव को मुख, नेत्र, पैर, मस्तक, कान, हाथ और प्राण दिये उसके गुणों को बार-बार याद करके उसको भूलो मत, किन्तु उन्हें याद कर-कर के दिन रात भजो ।
(क्रमशः)

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