मंगलवार, 8 सितंबर 2020

*नख शिख ध्वनि*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
🌷🙏🇮🇳 *#भक्तमाल* 🇮🇳🙏🌷
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*दीन लीन राम रंग राते, तिनको तूँ संग लावै ।*
*अपने अंग की युक्ति न जानै, सो मन तेरे भावै ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ३११)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,* 
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान* 
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami* 
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*कुंडलिया -*
*मय दया करि मान दे, अन्तरयामी आप ।*
*सोई कवि कोविद सिरै, जपै अजपा जाप ॥*
*जपे अजपा जाप, पाप त्रय-ताप न व्यापै ।*
*आशा जीत अतीत, भजन से कबहु न धापै ॥*
*तृप्त ज्ञान विज्ञान से, सर्व नख शिख ध्वनि होई ।*
*राघव रट सोई राम जन, यों भक्तमाल उर पोई ॥२६॥*
जिसको स्वयं अन्तर्यामी परमात्मा दया पूर्वक अनुग्रह करके सन्मान देते हैं, वही श्रेष्ठ कवि तथा विद्वान् माना जाता है । जो श्वास के साथ निरंतर होने वाला सोहं रूप अजपाजाप को जपता है …
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अर्थात् उस पर प्रमाद रहित अपनी वृत्ति निरंतर रखता है, उस पर किसी भी प्रकार का पाप तथा तीनों ताप अपना प्रभाव नहीं डाल सकते । वह संपूर्ण आशाओं को जीत कर गुणातीत हो जाता है और ब्रह्म-चिन्तन रूप भजन से कभी भी तृप्त नहीं होता अर्थात् निरंतर ब्रह्म चिन्तन करता रहता है किन्तु … 
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परोक्ष-ज्ञान तथा अपरोक्षज्ञान से तृप्त रहता है और जिसके शरीर में नख से लेकर शिखा तक अर्थात् रोम रोम से अनाहत नादरूप नाम की ध्वनि होती रहती है, वही राम का सच्चा भक्त है । मैंने उक्त प्रकार के भक्तों का यश-गान रूप रटन करने के लिये अपने हृदय में भक्तमाल पिरोकर तैयार की है और अब उसको ग्रंथ रूप में लिखने के लिये ही मंगलाचरण कर रहा हूँ । 
(क्रमशः)

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