सोमवार, 7 सितंबर 2020

= *निन्दा का अंग १२३(१/४)* =

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*दादू निंदक बपुरा जनि मरै, पर उपकारी सोइ ।*
*हम को करता ऊजला, आपण मैला होइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*निन्दा का अंग १२३*
इस अंग में निंदक संबंधी विचार प्रकट कर रहे हैं ~ 
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निज तीरथ निन्दक सही, निन्दा नीर सु माँहिं ।
रज्जब रज मल ऊतरै, घट गम्भीर सुन्हाहिं ॥१॥ 
निश्चय ही निंदक निजी तीर्थ है, उसमें निन्दा रूप जल भरा है, गम्भीर अंत:करण वाले संत जन ही इसमें स्नान करते हैं अर्थात निंदा से व्यथित नहीं होते । जैसे जल से रज - मैल उतरते हैं वैसे ही निंदा तीर्थ के स्नान से पाप उतरते हैं । 
निन्दक नाम समान हैं, जिनसौं प्राणि पवित्र । 
मन वच कर्म रज्जब कहै, ऐसे और न मित्र ॥२॥ 
निंदा द्वारा जिनसे प्राणी पवित्र होते हैं, वे निन्दक ईश्वर नाम के समान हैं वा जिन भगवान के नामों से प्राणी पवित्र होते हैं उन नामों के समान ही निंदक हैं । हम मन वचन और कर्म से कहते हैं ऐसे मित्र अन्य नहीं हैं । 
निन्दक निज जन सारिखो१, मन मल-मंजनहार२ । 
सदा सनेही संग है, कदे३ न छोड़ै लार४ ॥३॥ 
निंदक निजी सेवक के समान१ है । जैसे सेवक वस्त्र तथा शरीर के मैल को साफ२ करता है, वैसे ही निंदक मन के पाप को साफ करने वाला है और निंदक प्रेमी के समान है सदा साथ रहता है अर्थात निंदा करता रहता है कभी३ भी पीछा४ नहीं छोड़ता । 
निन्दक औषधि अन्न गति१, मित्र मई२ गुरु देव । 
एक हि ठाहर एक है, शोधे भिन्न सु भेव३ ॥४॥ 
निंदक की चेष्टा१ औषधि और अन्न के समान है, जैसे औषधि रोग मिटाती है और अन्न भूख मिटाता है, वैसे ही निंदक पाप मिटाता है । पुन: निंदक मित्र तथा गुरुदेव स्वरूप२ है, मित्र दुख निवृत्ति द्वारा और गुरु अज्ञान निवृत्ति द्वारा सुख देते हैं, वैसे ही निंदक भी पाप निवृत्ति द्वारा सुख देते हैं । इस प्रकार सारग्राहकता रूप एक स्थान में तो निंदक और सज्जन एक ही हो जाते हैं किन्तु विचार करने पर दोनों का रहस्य३ भिन्न ही होता है ।
(क्रमशः)

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