गुरुवार, 17 सितंबर 2020

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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग वसँत २३(गायन समय प्रभात ३ से ६ तथा वसँत ॠतु)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३६९ - **परिचय प्राप्ति** । कड्डुक ताल
तहं खेलूँ पीव सूँ नित ही फाग, 
देख सखी री मेरे भाग ॥टेक॥
तहं दिन दिन अति आनन्द होइ, 
प्रेम पिलावै आप सोइ ।
सँगियन सेती रमेँ रास, 
तहं पूजा अरचा चरण पास ॥१॥
तहं वचन अमोलक सब ही सार, 
तहं बरतै लीला अति अपार ।
उमँग देइ तब मेरे भाग, 
तिहिं तरुवर फल अमर लाग ॥२॥
अलख देव कोइ जानै देव, 
तहं अलख देव की कीजै सेव ।
दादू बलि बलि बारँबार, 
तहं आप निरंजन निराधार ॥३॥
☀प्रत्यक्ष प्राप्ति का परिचय दे रहे हैं - हे सखी ! देख तो सही, मेरा कैसा अच्छा भाग्य है जो ध्यानावस्था में मैं अपने प्रियतम प्रभु के साथ प्रतिदिन होली के उत्सव के समान प्रेम का खेल खेलती हूं ।
☀उन प्रभु के पास प्रतिदिन ही आनँद होता रहता है, वे स्वयँ ही मुझे प्रेम - प्याला पिलाते हैं ।
☀मैं अपने साथी अन्त:करण इन्द्रियों के सहित उन प्रभु से रास खेलती हूं ।
☀वहां उन प्रभु के चरणों के पास रह कर ही अर्चना भक्ति द्वारा उनकी आराधना करती हूं ।
☀वहां का वचन - व्यवहार सभी सार रूप और अमूल्य होता है तथा अति अपार लीलायें होती रहती हैं ।
☀प्रभु मेरे भाग्यवश प्रसन्न होकर मुझे शुभाशीर्वाद देंगे, तब मेरे साधन वृक्ष पर अमर करने वाला अभेद ज्ञान रूप फल लगेगा ।
☀वे प्रभु मन - इन्द्रिय के अविषय हैं, उन निरंजन देव के रहस्यमय स्वरूप का आदि अन्त कोई नहीं जान सकता । वहां ध्यानावस्था में ही, उन अलख देव की सेवा करनी चाहिए ।
☀जो सविकल्प समाधि में निरंजन, निराधार, प्रभु भासते हैं, उनकी मैं बारँबार बलिहारी जाती हूं ।
(क्रमशः)

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