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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थोल्लास” ५२/५४)*
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*पदमसिंग ने चिट्ठी विपरित लिखी*
*धरयाजु पदमसिंघ रोष भया,*
*सेवत माता क्यूं रहि गया ।*
*पदमसिंघ पत्री लिख दीनी,*
*तामें बहुत सिखावन कीनी ॥५२॥*
पदमसिंघ राजा को राजा धराज्यू पर बहुत क्रोध आया कि धराज्यू राजा ने माता जी की सेवा क्यों बंद कर दी । पदमसिंघ ने एक पत्र धराज्यू जैमल को लिखा और उसमें अनेक प्रकार की शिक्षाऐं उपदेश, सलाहें उसमें लिखी ॥५२॥
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*पदमसिंघ की बुद्घि खराब*
*तूं दुर्भागी दुर्भगि को जायो,*
*अमर फल सो हाथि गंवायो ।*
*मनिष देह की पूजा लाई,*
*ता मंहि का प्रापति भाई ॥५३॥*
हे राजन धरयाजू जैमल तुम दुर्भाग्यशाली हो, दुर्भाग्यशाली माता से उत्पन्न हुए हो क्योकि आपने माता की सेवारूपी जो अमर फल था वह हाथ से गंवा दिया । आपने देवी माता की पूजा छोड़कर सतगुरु रूप मनुष्य देह की पूजा करते हो, हे भाई इसमें आपको क्या प्राप्त होने वाला है अर्थात् कुछ नहीं प्राप्त होगा ॥५३॥
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*चलणी, कोल्हू, कूकस, राखै,*
*रुधिर पीवे पै चीचड़ नाखे ।*
*मीन गहै मैल मुख मांहि,*
*चीकणे घडै जल लागे नांही ॥५४॥*
छलनी, कोल्हू, कूकस के समान मत रहो, अर्थात् छलनी में आटा निकल जाता है और छाणस अन्दर रह जाता है इसी प्रकार कोल्हू सार तत्व तैल निकल जाता है और खल बच जाती है इसी प्रकार छाज में कंकर रह जाते है और अनाज निकल जाता है और कंकर रह जाते है, चीचड़ के खून पीने के पश्चात उसको फेंक देते है । इसी प्रकार आपने देवी पूजन रूपी सार को छोडकर मनुष्य देह पूजन रूपी कंकर इकट्ठे कर रहे हो । मछली समुद्र में से मोती नहीं लेती गंदगी खाती है किन्तु जिस प्रकार चिकने घडे पर जल नहीं ठहरता उसी प्रकार मेरी बात तुम्हारे हृदय में नहीं लगेगी ॥५४॥
(क्रमशः)

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