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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थोल्लास” ४३/४५)*
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*बालक कूं पोषे महतारी,*
*ऐसै साधू पर उपगारी ।*
*स्वांति सीप की प्यास मिटावे,*
*ऐसैं दुनी सकल सुख पावे ॥४६॥*
जिस प्रकार माता दूध द्वारा अपने बालक का पोषण करती है ऐसे ही संत लोग सदुपदेश ज्ञान के द्वारा सब प्राणियों का कल्याण करते हैं । जिस प्रकार स्वाति नक्षत्र की बूंद सीप की प्यास बुझाती है । ऐसे ही संत वचनों से दुनियां सुख प्राप्त करती है ॥४६॥
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*अठारह भार घन पुरवै आसू,*
*करै उपगार गहै वेसासू ।*
*नहीं चाहि कछू मांनि बडाई,*
*रहै अनेच्छी बेपरवाही ॥४७॥*
अठारह भार वन वृक्षों पर बादल निरन्तर वर्षा करके सब की आशा पूर्ण करते हैं वे सारे संसार का उपकार करके विश्वास संतोंषप्रद कर लेते हैं । उन्हें न मान की व बडाई इच्छा है वे निस्पृह एवं बेपरवाह मस्त रहते हैं ॥४७॥
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*चंदन चाहि कछू नहीं करई,*
*अहि को ताप सकल जो हरई ।*
*कमोद चाहि नहीं अति चंदा,*
*दीपक चाहि न परे पतंगा ॥४८॥*
चन्दन भी कुछ नहीं चाहता है, किन्तु सर्पों का सारा संताप हर लेता है कुमुदिनी चंद्रमा से कुछ नहीं चाहती है । दीपक कुछ भी नहीं चाहता किन्तु पतंगा फिर भी उस पर गिरता है क्योंकि दीपक के साथ इनका प्रेम है ॥४८॥
(क्रमशः)

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