रविवार, 13 सितंबर 2020

*माया अथवा दया ?*

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*दादू मुझ ही मांही मैं रहूँ, मैं मेरा घरबार ।*
*मुझ ही मांही मैं बसूँ, आप कहै करतार ॥*
*दादू मैं ही मेरे आसरे, मैं मेरे आधार ।*
*मेरे तकिये मैं रहूँ, कहै सिरजनहार ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)*
*साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ*
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परिच्छेद ४९ 
दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ 
(१)वेदान्तवादियों का मत । माया अथवा दया ?
आज रविवार का दिन है । श्रावण कृष्णा प्रतिपदा, १९ अगस्त १८८३ ई. । अभी कुछ ही देर पहले देवी का भोग लगा और आरती हुई । अब मन्दिर बन्द हो गया है । श्रीरामकृष्ण देवी का प्रसाद पाने के बाद कुछ आराम कर रहे हैं । विश्राम के बाद – अभी दोपहर का समय ही है – वे अपने कमरे में तख्त पर बैठे हुए हैं । इसी समय मास्टर ने आकर उन्हें प्रणाम किया । थोड़ी देर बाद उनके साथ वेदान्त-सम्बन्धी चर्चा होने लगी ।
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श्रीरामकृष्ण(मास्टर से)- देखो, ‘अष्टावक्र-संहिता’ में आत्मज्ञान की बातें हैं । आत्मज्ञानी कहते हैं, ‘सोऽहम् अर्थात् मैं ही वह परमात्मा हूँ । यह वेदान्तवादी संन्यासियों का मत है । सांसारिक व्यक्तियों के लिए यह मत ठीक नहीं है । सब कुछ किया जा रहा है, फिर भी ‘मैं ही वह निष्क्रिय परमात्मा हूँ’ यह कैसे हो सकता है ? वेदान्तवादी कहते हैं कि आत्मा निर्लिप्त है । सुख-दुःख, पाप-पुण्य –ये सब आत्मा का कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते; परन्तु देहाभिमानी व्यक्तियों को कष्ट दे सकते हैं । धुआँ दीवार को मैला करता है, पर आकाश का कुछ नहीं कर सकता । कृष्णकिशोर ज्ञानियों की तरह कहा करता था कि मैं ‘ख’ अर्थात् आकाशवत् हूँ । वह परम भक्त था; उसके मुँह से यह बात भले ही शोभा दे, पर सब के मुँह में यह शोभा नहीं देती ।
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“पर ‘मैं मुक्त हूँ’ यह अभिमान बड़ा अच्छा है । ‘मैं मुक्त हूँ’ कहते रहने से कहनेवाला मुक्त हो जाता है । और ‘मैं बद्ध हूँ’ कहते रहने से कहनेवाला बद्ध ही रह जाता है । जो केवल यह कहता है कि ‘मैं पापी हूँ’ वही सचमुच गिरता है । कहते यही रहना चाहिए – ‘मैंने उनका नाम लिया है, अब मेरे पाप कहाँ ? मेरा बन्धन कैसा ?’
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“देखो, मेरा चित्त बड़ा अप्रसन्न हो रहा है । हृदय* ने चिट्ठी लिखी है कि वह बहुत बीमार है । यह क्या है – माया या दया?” (*हृदय श्रीरामकृष्ण के भानजे थे और १८८१ ई. तक कालीमन्दिर में रहकर लगभग २३ वर्ष तक इनकी सेवा की थी । उनका जन्मस्थान हुगली जिले के अन्तर्गत सिहोड़ ग्राम में था । श्रीरामकृष्ण का जन्मस्थान कामारपुकुर, यहाँ से दो कोस दूर है । ६२ वर्ष की अवस्था में हृदय का देहावसान हुआ ।) 


मास्टर भी क्या कहें – मौन रह गये ।
श्रीरामकृष्ण- माया किसे कहते हैं, पता है ? माता-पिता, भाई-बहन, स्त्री-पुत्र, भानजे-भानजी, भतीजे-भतीजी आदि आत्मीयजनों के प्रति प्रेम – यही माया है । और प्राणिमात्र से प्रेम का नाम दया है । मुझे यह क्या हुई – माया या दया ! हृदय ने मेरे लिए बहुत-कुछ किया था – बड़ी सेवा की थी – अपने हाथों मेरा मैला तक साफ किया था; पर अन्त में उसने उतना ही कष्ट भी दिया था । वह इतना अधिक कष्ट देता था, कि एक बार मैं बाँध पर जाकर गंगा में डूबकर देहत्याग करने तक को तैयार हो गया था । पर फिर भी उसने मेरा बहुत-कुछ किया था । इस समय यदि उसे कुछ रुपये मिल जाते, तो मेरा चित्त स्थिर हो जाता । पर मैं किस बाबू से कहूँ ! कौन कहता फिरे ! 
(क्रमशः)

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