शनिवार, 19 सितंबर 2020

= *निन्दा का अंग १२३(१७/२१)* =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *#श्री०रज्जबवाणी* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*दादू झूठ न कहिये साच को, साच न कहिये झूठ ।*
*दादू साहिब मानै नहीं, लागै पाप अखूट ॥*
=================
*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*निन्दा का अंग १२३*
.
तूटे तूटा रूप दिखाव हिं, नर नक्षत्र निरताय१ ।
रज्जब वह्नी२ वक्त्र३ वपु, जुगल४ सु जलता जाय ॥१७॥
निंदक नर और नक्षत्र टूटते हैं तब टूटा रूप तो दिखाते हैं किन्तु हे नर ! विचार१ कर, निंदक नर के मुख३ में और नक्षत्र के शरीर में अग्नि२ है तभी तो दोनों४ जलते हुये जाते हैं, अर्थात निंदक नर स्थान से गिरता है तब भी कटु वचन ही कहता हुआ जाता है और तारा टूटता है तब भी जलता हुआ ही जाता है ।
.
लोहा वैरी कनक का, मुक्त१ हिं पिशुन२ पषाण ।
यूं असाधु साधु को निंदहि, तुल्य न वक्त३ बखाण४ ॥१८॥
लोहा सुवर्ण कूटता है इससे सुवर्ण का शत्रु है, मोती१ को पत्थर तोड़ देता है इससे मोती लिये पत्थर दुष्ट२ है ऐसे ही असाधु साधु की निंदा करता है किन्तु समय३ पर उसका, कथन४ समान नहीं होता सुवर्ण, मोती और साधु ही श्रेष्ठ माने जाते हैं ।
.
मुख रसना प्रभुजी दिये, अपने सुमिरण काज ।
सुर नर निन्दा में खरच१, रज्जब खोई लाज ॥१९॥
प्रभु ने मुख और जिह्वा अपने स्मरण रूप कार्य को करने के लिये दिये हैं किन्तु प्राणी नर और देवताओं की निंदा में उसका उपयोग१ करके अपनी लज्जा खो देता है ।
.
दोष दोष कन१ आव हीं, काया नगरी माँहिं ।
शरीर शहर दुरमति कढै२, अवगुण आवहिं नाँहि ॥२०॥
काया नगरी में दोष के पास१ ही दोष आते हैं, शरीर रूप शहर से दुर्बुद्धि निकल२ जाय तो शरीर में अवगुण नहीं आयेंगे ।
.
याद न आवे तो भली, बुरी वस्तु मन माँहिं ।
पर की बुरी विचार तों, आप बुरे ह्वै जाँहिं ॥२१॥
बुरी वस्तु का मन में स्मरण न आये तो ही अच्छा है कारण - दूसरे का बुरा सोचने से सोचने वाले भी बुरे ही हो जाते हैं ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित निंदा का अंग १२३ समाप्तः ॥सा. ३९८४॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें