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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*७. हैरान कौ अंग ~ २१/२४*
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जैसा रूप बिचारिये, तैसा ही है मांहि ।
कहि जगजीवन अलख का, उनहारा३ कोइ नांहि ॥२१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हम परमात्मा का जैसा स्वरूप कल्पित करते हैं वे वैसे ही अतंर में रहते हैं उनका अपना कोइ आकार नहीं है । वे तो ब्रह्म हैं ।
{३. उनहारा - अनुहार(अनुकृति=समानता)}
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उस उनहारे वोहि है, उस बिन अउर न कोइ ।
कहि जगजीवन आदि हरि, अंत सोइ मधि जोइ ॥२२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु आकृति सम आप प्रभु ही है उन के बिना कोइ और वैसा हो ही नहीं सकता । वे ही आरम्भ मध्य व अंत है ।
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अक्षर ऊपर चढ़ि कहै, सो अक्षर अक्षर मांहि ।
कहि जगजीवन कोइ हरि, निर अक्षर कहै नांहि ॥२३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो हम प्रभु नाम उच्चारण करते हैं वे नाम के वर्ण प्रभु के ही हैं । प्रभुनाम सिमरण से ही मिलजाते हैं । कोइ अक्षर ऐसा नहीं है जिसमें प्रभु का नाम न हो ।
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निर अक्षर अक्षर कहै, षिर जस अक्षर होइ ।
कहि जगजीवन रांम गति, चीन्है बिरला कोइ ॥२४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो निरक्षर है वे भी भगवान के नामाक्षर जानते हैं । उनके भी आधार प्रभुनामाक्षर हैं ।
संत कहते हैं कि प्रभु की लीला कोइ विलक्षण ही जान पाता है ।
(क्रमशः)

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