गुरुवार, 10 सितंबर 2020

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*खोटा खरा परखिये, दादू कस-कस लेइ ।*
*साचा है सो राखिये, झूठा रहण न देइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पारिख का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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एक उत्तम संत थे, एक दिन अनजान में एक पापी व्यक्ति का अन्न उनके खाने में आया । गांव के एक सेठ का बच्चा संत की कुटिया के पास प्रतिदिन खेला करता था । आज संत के मन में सहसा पाप वृत्ति उठी । बच्चे के भूषणों के लोभ में आकर बच्चे को मार कर मंदिर में छिपा दिया । बालक की खोज हुई, संत से पूछा । संत कम्पायमान मन से हो कुछ बढाकर बात करने लगे । इतने में ही एक व्यक्ति ने कहा - "बच्चा अभी इन्हीं के पास था।" खोज की तो बच्चे का शव मिल गया ।
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केस राजा के पास गया, राजा ने यह सोचकर कि ऐसे संत से यह पाप कैसे हुआ, इनमें अन्य कारण अवश्य होगा, संत से पूछा कि "आज आपने भोजन कहां किया था ? संत "इस नगर के एक सुनार के यहां ।" राजा ने सुनार को बुलावाकर पूछा - "तेरे घर आज किस पैसे से अन्न बना था ।" सुनार - एक कसाई का भूषण बनाया था, उसी के पैसे का बना था ।" यह सुन कर राजा समझ गया कि हिंसक का अन्न खाने से ऐसा हुआ है । सेठ को भी समझाया और संत को छोड़ दिया ।
हो हिंसक के अन्न से, साधू हिंसक जान ।
शिशु हत्या की साधु ने, जान भूप सुजान ॥४॥

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