शनिवार, 19 सितंबर 2020

*ग्राह गह्यो गज को जल भीतर*

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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
🌷🙏🇮🇳 *#भक्तमाल* 🇮🇳🙏🌷
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*दादू पलक मांहि प्रकटै सही, जे जन करैं पुकार ।*
*दीन दुखी तब देखकर, अति आतुर तिहिं बार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ बिनती का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,* 
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान* 
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*ग्राह गह्यो गज को जल भीतर,*
*राम कह्यो हरि वेग उधार्यो ।*
*हंस स्वरूप धर्यो अज कारण,*
*प्रश्न करा सुत हेत विचार्यो ॥*
*रूप मनुतर धारि चवद्दह,*
*इन्द्र सुरेश हु कारज सार्यो ।*
*यज्ञ भये मनु राखन मंजुल१,*
*आदिरु अंत जगे२ विसतार्यो ॥१३॥*
१३. जब ग्राह ने गजराज को पकड़ कर जल के भीतर खैंचा तब गजराज ने आर्त स्वर द्वारा सर्वत्र रमने वाले राम से सहायता के लिये पुकार कर प्रार्थना की तब अति शीघ्र ही हरि अवतार लेकर ग्राह के प्राण हर कर गजराज का दुःख हरा था । 
१४. एक समय ब्रह्मा के मानस-पुत्र सनकादिक ने अपने पिता से प्रश्न किया था- “प्रभो ! चित्त स्वभाव से ही गुणों में जाता है और गुण चित्त के आश्रय रहते हैं, फिर इस संसार-सागर से पार होकर मुक्ति-पद चाहने वाला व्यक्ति इनको परस्पर कैसे अलग कर सकता है? ब्रह्माजी की कर्ममयी बुद्धि होने से वे बहुत कुछ विचार करने पर भी उक्त प्रश्न का उत्तर न दे सके-तब हरि का ध्यान किया । उसी समय वहां ब्रह्मा के लिये हँस रूप में हरि प्रकट हुये और सनकादि को कहा- “विषयों का पुनः पुनः सेवन करने से चित्त उनसे आविष्ट हो जाता है और फिर वासना रूप में चित्त से ही उनकी अभिव्यक्ति होती रहती है, इसलिये अपने शुद्ध स्वरूप को मेरा रूप जानकर चित्त और विषय रूप दोनों ही उपाधियों को त्याग देना चाहिये । इत्यादिक उपदेश से सनकादि का संशय दूर करा था । 
१५. ब्रह्मा के चौदह पुत्र रूप में मन्वन्तर अवतार धारण करके देवेश्वर इन्द्र के कार्य सिद्ध करते हैं । वे चौदह ये हैं- १.स्वायंभू, २.स्वारोचिष, ३.उत्तम, ४.तामस, ५.रैवत, ६.चाक्षुष, ७.वैवस्वत, ८.सावर्णि, ९.दक्ष सावर्णि, १०.ब्रह्म सावर्णि, ११.धर्मसावर्णि, १२.रुद्रसावर्णि, १३.देव सावर्णि, १४.इन्द्रसावर्णि । 
१६. रुचि प्रजापति की आकूति नामक स्त्री में यज्ञ-नाम से उत्पन्न हुये और यमादि देवताओं सहित स्वायंभुव मन्वन्तर में इन्द्र के पद में स्थित होकर जगत की रक्षा की और आदि से अन्त तक सुन्दर१ रूप से यज्ञों२ का विस्तार किया तथा स्वायंभुव मनु के उज्जवल१ यश की और मनु की रक्षा की ।
(क्रमशः)

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