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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*७. हैरान कौ अंग ~ १३/१६*
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सेस सहस्त्र मुख सूं करै, इसतुति विरंचि५ बिचार ।
कहि जगजीवन आदि थिति, ब्रह्मा लहै न पार ॥१३॥
(५. विरंचि - ब्रह्मा)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि शेष जी अपने सहस्त्र मुख से जिनकी स्तुति करते हैं ब्रह्मा विचार कर कहते हैं तब भी वे उनका आरम्भ नहीं जान पाते ।
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रांम अलख अबिगति अलख, अपरंपार अगाध ।
कहि जगजीवन निरंजन, निराकार कहैं साध ॥१४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम अलख हैं वे देखे नहीं जा सकते, उनकी लीला का भी पार नहीं है, वे अपार व अगाध अर्थात बहुत गहरे हैं अतः तभी साधुजन उन्हें निरंजन व निराकार कहते हैं ।
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मल मुत्तर धारी मनुष, एक बदन तिहि लाग ।
कहि जगजीवन ब्रह्म का, ते क्यों पावै थाग१ ॥१५॥
(१. थाग - गहराई)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि ये जीव देह धर्म धारण किये है अतः इसे एक ही मुख मिला है वे इस से ब्रह्म की थाह या गहराई कैसे जान सकते हैं ।
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उपज्या नहीं अरु सकल है, आया नहीं अरु आहि ।
कहि जगजीवन चित रही, आदि लहन की चाहि ॥१६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि वे उत्पन्न नहीं हैं फिर भी सम्पूर्ण हैं । कहीं से आये नहीं फिर भी हैं । क्योंकि वे चित में हर समय हैं कि उनका आरम्भ कहां से है ये जानें ।
(क्रमशः)

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