बुधवार, 9 सितंबर 2020

= १०३ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*दादू जब ही साधु सताइये, तब ही ऊँघ पलट ।*
*आकाश धँसै, धरती खिसै, तीनों लोक गरक ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ काल का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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जयदेवजी के हाथ पैर काटने वालों को जयदेवजी ने धन दिलवाया तथा उनके साथ रक्षा के लिये सिपाही भी भेजे । सिपाहियों ने उन साधु भेषधारी डाकुओं से पुछा - "महाराज ! जयदेवजी ने आपकी सेवा तो बहुत करवायी यह क्या बात है ?" डाकू - "जयदेवजी और हम एक राजा के नौकर थे । जयदेव से एक भारी गुनाह हो गया था । इस कारण राजा ने इन्हें मृत्यु दण्ड सुनाया था और वध के लिये हमारे हाथ में दिया था । हमने दया करके उन्हें मारा नहीं हाथ पैर काट कर छोड़ दिया था । वही उपकार मानते ही.... ।" इतना कहते ही पृध्वी फटी और साधु भेषधारी डाकू उसमें मिल गये ।
निर्दोषन में दोष का, कथन महा अध होय ।
दोष देत जयदेव को, धरणि मिले खल सोय ॥१८७॥

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