सोमवार, 5 अक्टूबर 2020

= *कुसंग सुसंग का अंग १२७(५/८)* =

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*शुध बुध सौं सुख पाइये, कै साधु विवेकी होइ ।*
*दादू ये बिच के बुरे, दाधे रीगे सोइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*कुसंग सुसंग का अंग १२७* 
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रज्जब कुसंग सुसंग का, केवल गहण१ विचार ।
आतम उर२ अर्भक३ उपजि, पेखि पलट व्यवहार ॥५॥
कुसंग और सुसंग के केवल विचार ग्रहण१ करने से ही उसका प्रभाव पड़ता है, न ग्रहण करे तो कुछ नहीं, देखो, मातारूप जीवात्मा के पेट२ से बच्चा३ होता है किन्तु बच्चे का व्यवहार माता से बदला हुआ भी देखा जाता है, वह माता के दोष-गुण को ग्रहण करे तब उस पर माता के कुसंग सुसंग का क्या प्रभाव पड़ सकता है ।
देखो नारी नीम नर, गहण हमाइ१ अतीत२ ।
नाग सु भोजन शिशु मनिष, छांह छांनि३ परतीत४ ॥६॥
देखो, कुसंग का प्रभाव - रजस्वला नारी की छाया पड़ने से काला सर्प अंधा हो जाता है । नीम के नीचे चिर तक खुला भोजन रखा रहने से उसमें कड़वापन आ जाता है, नर की छाया पड़ने से शिशु डर जाता है । राहु केतु की छाया से चन्द्र - सूर्य का ग्रहण होता है, सुसंग का प्रभाव - हुमा१ पक्षी की छाया पड़ने से मनुष्य राजा हो जाता है । गुणतीत२ संत की सत्संग रूप छाया से जीव ब्रह्म हो जाता है । इस प्रकार छाया का विचार३ करके अर्थात किसके संग से क्या होता है, इसे जानकर ही किसी पर विश्वास४ करना चाहिये ।
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उपकंठ१ उदधि उत्तम जनहुं, सुख श्रीकण२ सु लहंत३ ।
रज्जब मध्यम नापिगा४, धर५ नट तट सु बहंत ॥७॥
उत्तम जन समुद्र तट के पास१ के स्थान के समान हैं, जैसे समुद्र तट पर रत्नादि२ मिल३ जाते हैं, वैसे ही उत्तम जनों के पास ब्रह्मानन्द मिलता है और बीच के नर पृथ्वी५ की नदी४ के समान हैं जैसे नदी तट से बहा ले जाती है वैसे ही बीच के नर अपने कुसंग से संसार में बहाते हैं ।
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एक मिलाय सु अमी में, एक हलाहल ऐन१ ।
रज्जब संगति कीजिये, देखि सु चैन२ अचैन३ ॥८॥
एक तो ब्रह्म रूप अमृत में मिलाता है और साक्षात१ विषयरूप महाविष में मिलाता है, अत: किससे सुख२ मिलता है और किससे दु:ख३ मिलता है, यह देखकर के ही संग करना चाहिये ।
(क्रमशः)

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