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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग भैरूँ २४(गायन समय प्रात:काल)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३८५ - प्रतिताल
राम नाम तत काहे न बोलै,
रे मन मूढ़ अनत जनि डोलै ॥टेक॥
भूला भरमत जन्म गमावै,
यहु रस रसना काहे न भावै ॥१॥
क्या झक औरे परत जँजाले,
वाणी विमल हरि काहे न संभालै ॥२॥
राम विसार जन्म जनि खोवै,
जपले जीवन साफल होवै ॥३॥
सार सुधा सदा रस पीजे,
दादू तन धर लाहा लीजे ॥४॥
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अरे मूर्ख मन ! अन्य स्थानों में क्यों भटकता है ? कल्याण - साधनों का सार राम - नाम क्यों नहीं बोलता ?
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भ्रम वश भूलकर भटकते हुये अपने मानव जन्म को व्यर्थ खो रहा है, राम का नाम तथा यश - गान करते हुये यह उत्तम रस रसना से क्यों नहीं लेता ?
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क्यों व्यर्थ परिश्रम करके यम - जाल में पड़ता है ? सँतों की पवित्र वाणी का आश्रय लेकर हरि स्मरण क्यों नहीं करता ?
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राम को भूलकर जन्म व्यर्थ क्यों खो रहा है ? राम नाम का जप कर, जिससे तेरा जीवन सफल हो ।
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अरे साधनों का सार स्मरण - सुधा - रस का सदा पान कर, मानव शरीर को धारण करके यह लाभ तो अवश्य ले ।
(क्रमशः)

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