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🌷 #श्रीरामकृष्ण०वचनामृत 🌷
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*दादू पड़दा भ्रम का, रह्या सकल घट छाइ ।*
*गुरु गोविन्द कृपा करैं, तो सहजैं ही मिट जाइ ॥*
(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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मणि- निरवच्छिन्न आनन्द यहाँ कहाँ है ?
श्रीरामकृष्ण- हाँ, यह ठीक है ।
श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर के सामने आए । माता को भूमिष्ठ हो प्रणाम किया । मणि ने भी प्रणाम किया । श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर के सामने चबूतरे पर बिना किसी आसन के कालीमाता की ओर मुँह किए बैठे हुए हैं । केवल लाल धारीदार धोती पहने हैं । उसका कुछ हिस्सा पीठ पर पड़ा है और कुछ कन्धे पर । पीछे नाटमन्दिर का एक स्तम्भ है । पास ही मणि बैठे हैं ।
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मणि- यही अगर हुआ तो देहधारण की फिर क्या आवश्यकता है ? देख तो यह रहा हूँ कि कुछ कर्मों का भोग करने के लिए ही देह धारण करना होता है । वह क्या कर रहा है वही जाने । बीच में हम लोग पिस रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण- चना अगर विष्ठा पर पड़ जाए तो भी चने का ही पौधा निकलता है ।
मणि- फिर भी अष्ट-बन्धन तो हैं ही ।
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*सच्चिदानन्द ही गुरु, उनकी कृपा से ही मुक्ति*
श्रीरामकृष्ण- अष्ट बन्धन नहीं, अष्टपाश हैं तो इससे क्या ? उनकी कृपा दृष्टि होने पर एक क्षण में अष्टपाश छूट सकते हैं, किस तरह कि हजार साल के अँधेरे कमरे में दीपक ले जाने पर एक क्षण में अँधेरा दूर हो जाता है, थोड़ा थोड़ा करके नहीं जाता । बाजीगर का एक खेल तुमने देखा है? कितनी ही गाँठ लगी रस्सी का एक छोर वह एक जगह बाँध देता है और दूसरा छोर अपने हाथ से पकड़े रहता है । उसने रस्सी को हिलाया नहीं कि सब ग्रन्थियाँ एक साथ खुल गयीं । परन्तु दूसरा आदमी चाहे लाख उपाय करे, उसे खोल नहीं सकता । श्रीगुरु की कृपा से सब ग्रन्थियाँ एक क्षण में ही खुल जाती हैं ।
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“अच्छा, केशव सेन इतना बदल कैसे गया ? – बताओ तो । परन्तु यहाँ खूब आता था । यहीं से नमस्कार करना सीखा था । एक दिन मैंने कहा, साधुओं को इस तरह से नमस्कार नहीं करना चाहिए । एक दिन ईशान के साथ मैं गाड़ी पर कलकत्ता जा रहा था । उसने मुझसे केशव सेन की सब बातें सुनीं । हरीश अच्छा कहता है- यहाँ से सब चेक पास करा लेने होंगे, तब बैंक में रुपये मिलेंगे ।” (सब हँसते हैं)।
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मणि निर्वाक रहकर सब बातें सुन रहे हैं । उन्होंने समझा, गुरु के रूप में सच्चिदानन्द स्वयं चेक पास करते हैं ...
श्रीरामकृष्ण- विचार न करना । उन्हें कौन जान सकता है ? न्यांगटा कहता था, मैंने सुन रखा है, उन्हीं के एक अंश से यह ब्रह्माण्ड बना है ।
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“हाजरा में बड़ी विचारबुद्धि है । वह हिसाब करता है, इतने में संसार हुआ और इतना बाकी रह गया ! उसका हिसाब सुनकर मेरा माथा ठनकने लगता है । मैं जानता हूँ, मैं कुछ नहीं जानता । कभी तो उन्हें अच्छा सोचता हूँ और कभी उन्हें बुरा मानता हूँ । उनको मैं क्या समझूँगा ?”
मणि-जी हाँ, क्या कोई उन्हें समझ सकता है ? जिसकी जैसी बुद्धि है, उतनी ही से वह सोचता है, मैं सब कुछ समझ गया । आप जैसा कहते हैं, एक चींटी चीनी के पहाड़ के पास गयी थी, उसका जब एक दाने से पेट भर गया तब उसने कहा, अब की बार आऊँगी तो पहाड़ का पहाड़ उठा के जाऊँगी !
(क्रमशः)
मणि- निरवच्छिन्न आनन्द यहाँ कहाँ है ?
श्रीरामकृष्ण- हाँ, यह ठीक है ।
श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर के सामने आए । माता को भूमिष्ठ हो प्रणाम किया । मणि ने भी प्रणाम किया । श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर के सामने चबूतरे पर बिना किसी आसन के कालीमाता की ओर मुँह किए बैठे हुए हैं । केवल लाल धारीदार धोती पहने हैं । उसका कुछ हिस्सा पीठ पर पड़ा है और कुछ कन्धे पर । पीछे नाटमन्दिर का एक स्तम्भ है । पास ही मणि बैठे हैं ।
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मणि- यही अगर हुआ तो देहधारण की फिर क्या आवश्यकता है ? देख तो यह रहा हूँ कि कुछ कर्मों का भोग करने के लिए ही देह धारण करना होता है । वह क्या कर रहा है वही जाने । बीच में हम लोग पिस रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण- चना अगर विष्ठा पर पड़ जाए तो भी चने का ही पौधा निकलता है ।
मणि- फिर भी अष्ट-बन्धन तो हैं ही ।
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*सच्चिदानन्द ही गुरु, उनकी कृपा से ही मुक्ति*
श्रीरामकृष्ण- अष्ट बन्धन नहीं, अष्टपाश हैं तो इससे क्या ? उनकी कृपा दृष्टि होने पर एक क्षण में अष्टपाश छूट सकते हैं, किस तरह कि हजार साल के अँधेरे कमरे में दीपक ले जाने पर एक क्षण में अँधेरा दूर हो जाता है, थोड़ा थोड़ा करके नहीं जाता । बाजीगर का एक खेल तुमने देखा है? कितनी ही गाँठ लगी रस्सी का एक छोर वह एक जगह बाँध देता है और दूसरा छोर अपने हाथ से पकड़े रहता है । उसने रस्सी को हिलाया नहीं कि सब ग्रन्थियाँ एक साथ खुल गयीं । परन्तु दूसरा आदमी चाहे लाख उपाय करे, उसे खोल नहीं सकता । श्रीगुरु की कृपा से सब ग्रन्थियाँ एक क्षण में ही खुल जाती हैं ।
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“अच्छा, केशव सेन इतना बदल कैसे गया ? – बताओ तो । परन्तु यहाँ खूब आता था । यहीं से नमस्कार करना सीखा था । एक दिन मैंने कहा, साधुओं को इस तरह से नमस्कार नहीं करना चाहिए । एक दिन ईशान के साथ मैं गाड़ी पर कलकत्ता जा रहा था । उसने मुझसे केशव सेन की सब बातें सुनीं । हरीश अच्छा कहता है- यहाँ से सब चेक पास करा लेने होंगे, तब बैंक में रुपये मिलेंगे ।” (सब हँसते हैं)।
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मणि निर्वाक रहकर सब बातें सुन रहे हैं । उन्होंने समझा, गुरु के रूप में सच्चिदानन्द स्वयं चेक पास करते हैं ...
श्रीरामकृष्ण- विचार न करना । उन्हें कौन जान सकता है ? न्यांगटा कहता था, मैंने सुन रखा है, उन्हीं के एक अंश से यह ब्रह्माण्ड बना है ।
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“हाजरा में बड़ी विचारबुद्धि है । वह हिसाब करता है, इतने में संसार हुआ और इतना बाकी रह गया ! उसका हिसाब सुनकर मेरा माथा ठनकने लगता है । मैं जानता हूँ, मैं कुछ नहीं जानता । कभी तो उन्हें अच्छा सोचता हूँ और कभी उन्हें बुरा मानता हूँ । उनको मैं क्या समझूँगा ?”
मणि-जी हाँ, क्या कोई उन्हें समझ सकता है ? जिसकी जैसी बुद्धि है, उतनी ही से वह सोचता है, मैं सब कुछ समझ गया । आप जैसा कहते हैं, एक चींटी चीनी के पहाड़ के पास गयी थी, उसका जब एक दाने से पेट भर गया तब उसने कहा, अब की बार आऊँगी तो पहाड़ का पहाड़ उठा के जाऊँगी !
(क्रमशः)

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