गुरुवार, 15 अक्टूबर 2020

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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग भैरूँ २४(गायन समय प्रात:काल)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३९२ - *जीवित मृतक* । एक ताल
जब यहु मैं मैं मेरी जाइ,
तब देखत वेग मिलै राम राइ ॥टेक॥
मैं मैं मेरी तब लग दूर,
मैं मैं मेटि मिलै भरपूर ॥१॥
मैं मैं मेरी तब लग नांहिं,
मैं मैं मेटि मिलै मन मांहि ॥२॥
मैं मैं मेरी न पावै कोइ,
मैं मैं मेटि मिले जन सोइ ॥३॥
दादू मैं मैं मेरी मेटि,
तब तूँ जान राम सौं भेटि ॥४॥
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जीवितावस्था में ही मृतक के समान निर्द्वन्द्व होने से ब्रह्म साक्षात्कार होता है, यह कहते हैं - जब "मैं बली हूं, मैं धनी हूं, यह मेरी सम्पत्ति है" इत्यादिक अहँकार हृदय से चला जायगा, तब देखते २ जीवितावस्था में ही शीघ्र विश्व के राजा राम मिल जायेंगे ।
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जब तक "मैं - मैं, मेरी" है तब तक राम दूर ही रहेंगे । "मैं - मैं" को मिटा दे, फिर तो सब विश्व में परिपूर्ण रूप से भासते हुये तुझे प्रभु मिलेंगे ।
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जब तक "मैं मैं मेरी" है तब तक वे प्रभु नहीं के समान ही हैं । "मैं मैं" मिटादे फिर तो तेरे मन में ही तुझे मिल जायेंगे । "मैं - मैं, मेरी" रहते हुये उन प्रभु को कोई भी नहीं प्राप्त कर सकता ।
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"मैं मैं" को मिटा कर प्रभु से मिलता है वही भक्त है । पहले "मैं मैं मेरी" यह अहँकार मिटा और जब मिट जाय तब तू समझना कि अब राम से मिलन होगा ।
(क्रमशः)

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