गुरुवार, 15 अक्टूबर 2020

समर्थता का अंग २१ - ९/१२

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🦚 #श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका 🦚
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग २१ - ९/१२) 
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*॥ पोष प्रतिपाल रक्षक ॥
*दादू सोई सही साबित हुआ, जा मस्तक कर देइ ।*
*गरीब निवाजे देखतां, हरि अपना कर लेइ ॥९॥*
जिसके मस्तक पर भगवान् ने अपना वरदहस्त रख दिया वह अवश्य ही मुक्त हो जाता है । इसलिये भगवान् के अपार सामर्थ्य को जानकर उनकी जो भक्ति करता है वह इसी जन्म में भगवान् को प्राप्त कर लेता है । लिखा है कि जो संसार सागर में सुख दुःख आदि वायु से आहत हो रहे हैं पुत्र पुत्री आदि के पालन के भार से आर्त हैं । विषय रूपी विषम जल राशि में बिना नौका के डूब रहे हैं उन मनुष्यों के लिये एकमात्र जहाज रूप भगवान् ही शरण है ।
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*॥ सूक्ष्म मार्ग ॥*
*दादू सब ही मारग सांइयाँ, आगै एक मुकाम ।*
*सोई सन्मुख कर लिया, जाही सेती काम ॥१०॥*
भक्ति, योग, ध्यान, ज्ञान आदि सभी मार्ग प्रभु प्राप्ति करने वाले हैं । परन्तु साधक को जो मार्ग सुलभ तथा अच्छा लगता है उसी मार्ग से चलकर परमात्मा को प्राप्त कर लेता है ।
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*॥ पोष प्रतिपाल रक्षक ॥*
*मीरां मुझ सौं महर कर, सिर पर दीया हाथ ।*
*दादू कलियुग क्या करै, सांई मेरा साथ ॥११॥*
मेरे प्रभु ने मेरी भक्ति भाव से प्रसन्न होकर मेरे मस्तक पर अपना वरद हस्त धारण कर रखा है, और सदा मेरे साथ रहते हुए मेरी रक्षा करते हैं । अतः मुझे कलियुग से तथा उससे पैदा होने वाले दोषों से किंचिद् भी भय नहीं है । लिखा है कि-
हे वरद परमेश्वर ! तृष्णा रूपी जल, काम रूपी आंधी से उठी हुई मोह रूपी तरंगमाला स्त्री रूप भंवर और भाई रूपी ग्राहों से भरे हुए इस संसार रूपी समुद्र में डूबते हुए हम लोगों को अपने चरणारविन्द की भक्ति प्रदान कीजिये, जिससे हम आपको प्राप्त कर सकें ।
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*॥ ईश्‍वर समर्थाई ॥*
*दादू समर्थ सब विधि सांइयाँ, ताकी मैं बलि जाऊँ ।*
*अंतर एक जु सो बसै, औरां चित्त न लाऊँ ॥१२॥*
मेरा प्रभु हर प्रकार से सर्व समर्थ है । मैं उसी को नमस्कार करता हूँ और वह ही मेरे हृदय में निवास करता है । अतः उसी का स्मरण कर रहा हूँ । अब मेरा मन किसी भी मायिक पदर्थों की तरफ नहीं जाता है । 
विवेकचूडामणि में- हे सद्गुरो ! इस भवसिन्धु को मैं कैसे पार करूंगा ? उसका उपाय क्या है ? मेरी क्या गति होगी ? आप कृपा करके मेरे इस संसार दुःख का नाश करो । तथा इससे मेरी रक्षा कीजिये । इस प्रकार शरण में आये हुए तथा संसार दावानल से संतप्त शिष्य को देखकर दया से द्रवीभूत होकर सहसा मेरे को अभय बना दिया ।
(क्रमशः)


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