🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 सत्यराम सा 卐 🙏🌷
🌷 #श्रीरामकृष्ण०वचनामृत 🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*तहँ सहज रहै सो स्वामी, सब घट अंतरजामी ।*
*सकल निरन्तर वासा, रट दादू संगम पासा ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २०७)
================
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
.
(३)
*चिन्मय रूप । ज्ञान और विज्ञान । ‘ईश्वर ही वस्तु है’*
श्रीरामकृष्ण एकान्त में मणि के साथ बातचीत कर रहे हैं ।
मणि- अच्छा, वही अगर सब कुछ हुए हैं, तो इस तरह के अनेक भाव क्यों दीख पड़ते हैं ?
श्रीरामकृष्ण- विभु के स्वरूप से वे सर्वभूतों में हैं परन्तु शक्ति की विशेषता है । कहीं तो उनकी विद्याशक्ति है और कहीं अविद्याशक्ति, कहीं ज्यादा शक्ति है और कम । देखो न, आदमियों के भीतर ठग-चोर भी हैं और बाघ जैसे भयानक प्रकृतिवाले भी हैं । मैं कहता हूँ, ठगनारायण हैं, बाघनारायण है ।
.
मणि-(सहास्य)- जी, उन्हें तो दूर ही से नमस्कार करना चाहिए । बाघनारायण के पास जाकर अगर कोई उन्हें भर बाँह भेंटने लगे, तब तो वे उसे कलेवा ही कर जाएँ ।
श्रीरामकृष्ण- वे और उनकी शक्ति – ब्रह्म और शक्ति – इसके सिवाय और कुछ नहीं है । नारद ने रामचन्द्रजी से स्तव करते हुए कहा – हे राम, तुम्हीं शिव हो, सीता भगवती हैं; तुम ब्रह्मा हो, सीता ब्रह्माणी हैं; तुम इन्द्र हो, सीता इन्द्राणी हैं; तुम नारायण हो, सीता लक्ष्मी; पुरुषवाचक जो कुछ हैं, सब तुम्हीं हो, स्त्रीवाचक जो कुछ है, सब सीता ।
मणि- और चिन्मय रूप ?
.
श्रीरामकृष्ण कुछ देर बाद विचार करने लगे । फिर धीमे स्वर में कहा, “वह किस तरह है बताऊँ – जैसे पानी का......। ये सब बातें साधना करने पर समझ में आती है ।
“रूप पर विश्वास करना । जब ब्रह्मज्ञान होता है, अभेदता तब होती है । ब्रह्म और शक्ति अभेद हैं । जैसे अग्नि और उसकी दाहिका शक्ति । अग्नि को सोचने पर साथ ही उसकी दाहिका शक्ति को भी सोचना पड़ता है; और दाहिका शक्ति को सोचने पर अग्नि को भी सोचना पड़ता है; जैसे दूध और दूध की धवलता, जल और उसकी हिमशक्ति ।
.
“परन्तु ब्रह्मज्ञान के बाद भी अवस्था है । ज्ञान के बाद विज्ञान है । जिसे ज्ञान है, जिसे बोध हो गया, उसमें अज्ञान भी है । शत पुत्रों के शोक से वशिष्ठ को भी रोना पड़ा था । लक्ष्मण के पूछने पर राम ने कहा, भाई, ज्ञान और अज्ञान के पार जाओ; जिसे ग्यान है, उसे अज्ञान भी है । पैर में अगर काँटा चुभ जाय, तो एक दूसरा काँटा लेकर वह निकाल दिया जात है, फिर उसके साथ दूसरा काँटा भी फेंक दिया जाता है ।
.
मणि- क्या अज्ञान और ज्ञान दोनों फेंक दिये जाते हैं ?
श्रीरामकृष्ण- हाँ, इसीलिए विज्ञान की आवश्यकता है ।
“देखो न, जिसे उजाले का ज्ञान है, उसे अँधेरे का भी है; जिसे सुख का बोध है, उसे दुःख का भी है; जिसे पुण्य का विचार है, उसे पाप का भी है; जिसे भले का स्मरण है, उसे बुरे का भी है; जिसे शुचिता का अनुभव है, उसे अशुचिता का भी है; जिसे ‘अहं’ का ध्यान ही, उसे ‘तुम’ का भी है !”
“विज्ञान –अर्थात् उन्हें विशेष रूप से जानना ।
.
लकड़ी में आग है, इस बोध इस विश्वास-का नाम है ज्ञान, और उस आग से खाना पकाना, खाना खाकर हृष्ट-पुष्ट होना, इसका नाम है विज्ञान । ईश्वर हैं, हृदय में यह बोध होना इसका नाम है ज्ञान और उनके साथ वार्तालाप, उन्हें लेकर आनन्द करना-चाहे जिस भाव से हो, दास्य या सख्य या वात्सल्य या मधुर से-इसका नाम है विज्ञान ।
.
जीव और यह प्रपंच वे ही हुए हैं, इसके दर्शन करने का नाम है विज्ञान । एक विशेष मत के अनुसार कहा जाता है कि दर्शन हो नहीं सकते, कौन किसके दर्शन करे ? वह तो अपने ही स्वरूप के दर्शन करता है । कालेपानी में जहाज जब चला जाता है, तब लौट नहीं सकता, लौटकर खबर नहीं दे सकता ।”
मणि- जैसा आप कहते हैं, मानूमेण्ट के ऊपर चढ़ जाने पर फिर नीचे की खबर नहीं रहती कि गाड़ी, घोड़े, मेम, साहब, घर-द्वार, दूकाने, आफिस कहाँ है ।
श्रीरामकृष्ण- अच्छा, आजकल कालीमन्दिर मैं नहीं जाया करता, कुछ अपराध तो न होगा ? नरेन्द्र कहता था, ये अब भी कालीमन्दिर जाया करते हैं ?
मणि- जी, आपकी नयी नयी अवस्थाएँ हुआ करती हैं । आपका भला अपराध क्या है !
.
श्रीरामकृष्ण- अच्छा, हृदय के लिए उन लोगों ने सेन से कहा था, ‘हृदय बहुत बीमार है, उसके लिए आप दो धोतियाँ और दो कमीज लेते आइयेगा, हम लोग उसके गाँव में भेज देंगे ।” सेन बस दो ही रुपये लाया । यह भला क्या है ? इतना धन है और यह दान ! कहो जी !
मणि- जी, मेरी समझ में तो यह आता है कि जिसे ईश्वर की जिज्ञासा है, ज्ञानलाभ जिसका उद्देश्य है, वह कभी ऐसा नहीं कर सकता ।
श्रीरामकृष्ण- ईश्वर ही वस्तु है और सब अवस्तु ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें