🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *#श्री०रज्जबवाणी* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*दादू साचा लीजिये, झूठा दीजे डार ।*
*साचा सन्मुख राखिये, झूठा नेह निवार ॥*
=================
*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*कुसंगति का अंग १२६*
.
रज्जब नाणा१ गांठि का, खोटा चले न हाटि ।
ता सौ मोह न कीजिये, डारि देहु किन२ काटि ॥१३॥
अपनी गांठ का सिक्का१ हाट पर नहीं चलता तब वह खोटा है, उससे मोह न करो, उसको काट कर पटक क्यों२ नहीं देते ? वैसे ही बुरे मनुष्य से मोह न करके उसे त्याग ही देना चाहिये ।
.
रज्जब अहि१ अंगुरी लगै, तंत२ मंत३ करि काटि ।
तनक४ तजै तन ऊबरै, तो ब५ बधाई बाँटि ॥१४॥
यदि अंगुली को सर्प१ काट ले तो उसे निश्चय२ ही तत्काल३ काट डालना चाहिये । छोटी४ सी अंगुली त्यागने से जब शरीर बच जाता है, तब५ बधाई ही बांटना चाहिये । वैसे ही कुसंग के बुरे परिणाम से बचने के लिये थोड़ा त्याग करना पड़े तो तत्काल त्याग देना चाहिये ।
.
रज्जब काल कुसंग है, काचे को तु विशेख ।
जीया चाहे परहरी१, मरण मतै२ करि देख ॥१५॥
कुसंग काल रूप है और कच्चे विचार वाले को तो विशेष हानिकर है, यदि ब्रह्म प्राप्ति रूप जीवन चाहता है तब तो त्याग१ दे और बारंबार मरण का ही सिद्धान्त२ प्रिय है तो करके देख ले ।
.
पांवर परसै१ पांव दे, बाइल२ मिलतों बाव ।
रज्जब देखो दृष्टि ये, कुसंगति सु स्वभाव ॥१६॥
पांवर पुरुष छूता१ भी है तो पैर की देता है, और वायु२ वाला पदार्थ खाने को मिलता है तो वायु ही बढाता है, तुम स्वयं अपनी विचार दृष्टि से कुसंगति का स्वभाव देख सकते हो ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें