🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु* 🌷
*दादू ऐसे महँगे मोल का, एक सांस जे जाइ ।*
*चौदह लोक समान सो, काहे रेत मिलाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ स्मरण का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु*, *मनुज देह*
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एक जाट का खेत नदी तट पर था । पानी द्वारा पृथ्वी कटकर उसमें एक लालों की हंडिया निकली । जाट ने उसको पत्थर समझ कर अपने गोफे में डाल-डाल कर पक्षियों के पीछे फेंक-फेंक नदी में पटक दिया । उनमें से एक उसका बच्चा उठा कर ले गया था । एक जौहरी ने उसे ले लिया और जाटनी को उसकी कीमत में बहुत से रु. दे दिये, जब जाट को ज्ञात हुआ तब वह बहुत विलाप करता हुआ यह कहा कि ऐसे तो मैंने बहुत खो दिये रोने लगा । इसी प्रकार मनुष्य देह के श्वास के मुल्य का जब ज्ञान होता है तब अन्त में पश्चाताप ही करना पड़ता है ।
व्यर्थ गमाये श्वास के, फिर हो पश्चाताप ।
लाल खोई जिमि जाट इक, करने लगा विलाप ॥८९॥

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