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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग भैरूँ २४(गायन समय प्रात:काल)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३८६ - **तत्वोपदेश** । प्रतिताल
आप आपण में खोजो रे भाई,
वस्तु अगोचर गुरु लखाई ॥टेक॥
ज्यों मही बिलोयें माखण आवै,
त्यों मन मथियां तैं तत पावै ॥१॥
काष्ठ हुताशन१ रह्या समाई,
त्यों मन मांहीं निरंजन राई ॥२॥
ज्यों अवनी२ में नीर समाना,
त्यों मन मांहीं साच सयाना ॥३॥
ज्यों दर्पण के नहिं लागै काई,
त्यों मूरति मांहीं निरख लखाई ॥४॥
सहजैं मन मथियां तैं तत पाया,
दादू उन तो आप लखाया ॥५॥
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आत्म तत्व प्राप्ति के लिए उपदेश कर रहे हैं - हे भाई ! तुम स्वयँ ही गुरु की बताई हुई पद्धति से भजन - विचारादि साधन द्वारा इन्द्रियातीत आत्म वस्तु को खोजोगे, तब गुरुदेव सँकेत मात्र से ही तुम्हें दिखा देंगे ।
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जैसे दही को मन्थन करने से मक्खन हाथ आता है, वैसे ही मन में ध्यान - विचार करने से आत्म - तत्व प्राप्त होता है ।
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जैसे काष्ठ में व्यापक अग्नि१ रहता है, वैसे ही मन में विश्व के राजा निरंजन ब्रह्म है ।
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जैसे पृथ्वी२ में जल है, वैसे ही हे चतुर ! मन में सत्य ब्रह्म है ।
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जैसे दर्पण में स्थित प्रतिविम्ब के दर्पण का मैल नहीं लगता, वैसे ही शरीर में स्थित आत्म – स्वरूप ब्रह्म को शरीर के विकार नहीं लगते ।
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तू विचार द्वारा देख, तो दिखाई देगा । जिसने मन से ध्यान - विचार किया है, उसने ब्रह्मात्म - तत्व को प्राप्त किया है और उसने अन्य साधकों को भी निजात्म - रूप से ब्रह्म का साक्षात्कार कराया है ।
(क्रमशः)

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