शनिवार, 10 अक्टूबर 2020

= ३९० =

 
🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷 
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷  
https://www.facebook.com/DADUVANI 
*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द* 
*राग भैरूँ २४(गायन समय प्रात:काल)* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
.
३९० - **समर्थाई** । प्रतिपाल 
ऐसो अलख अनँत अपारा,
तीन लोक जाको विस्तारा ॥टेक॥ 
निर्मल सदा सहज घर रहे, 
ताको पार न कोई लहै । 
निर्गुण निकट सब रह्यो समाइ, 
निश्चल सदा न आवै जाइ ॥१॥ 
अविनाशी है अपरँपार, 
आदि अनन्त रहे निरधार । 
पावन सदा निरन्तर आप, 
कला अतीत लिपत नहिं पाप ॥२॥ 
समर्थ सोई सकल भरपूर, 
बाहर भीतर नेड़ा न दूर । 
अकल आप कलै नहिं कोई, 
सब घट रह्यो निरंजन होई ॥३॥ 
अवरण आपैं अजर अलेख, 
अगम अगाध रूप नहिं रेख । 
अविगत की गति लखी न जाइ, 
दादू दीन ताहि चित लाइ ॥४॥ 
प्रभु की सामर्थ्य बता रहे हैं - यह त्रिलोकी जिनका विस्तरित विराट रूप है, वे प्रभु ऐसे अनन्त अपार हैं कि - उनका वास्तविक स्वरूप मन इन्द्रियों से नहीं देखा जाता । 
वे निर्मल हैं, सदा सहजावस्था रूप घर में रहते हैं, उनका पार कोई भी नहीं पाता । वे निर्गुण हैं, सबके समीप और सब में समाये हुये हैं । सदा निश्चल रहते हैं । व्यापक होने से उनमें जाना - आना नहीं बनता । 
वे सृष्टि के आदि और अन्त में भी निश्चय पूर्वक अविनाशी तथा अपरँपार रूप से रहते हैं । वे सदा पवित्र, निरन्तर कला विभाग से रहित रहते हैं, पाप से लिपायमान नहीं होते । 
वे समर्थ सब में परिपूर्ण हैं; बाहर भीतर एक रस हैं, सबके आत्म - स्वरूप होने से समीप वो दूर नहीं कहे जा सकते । वे स्वयँ निराकार हैं, इससे कालादि कोई भी उन्हें नष्ट नहीं कर सकते । माया रहित होकर भी सबके अन्त:करण में आत्म रूप से स्थित हैं । 
उनका कोई रँग नहीं । परिवर्तन बिना स्वयँ ही जरा रहित हैं । लेख - बद्ध नहीं हो सकते । अगम अगाध हैं, रूप - रेखा रहित हैं । जिन इन्द्रियों के अविषय प्रभु की सामर्थ्य अपार है, उनकी सीमा देखी नहीं जा सकती । मैं दीन तो उन प्रभु में ही चित्त लगावे रहता हूं । 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें