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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग भैरूँ २४(गायन समय प्रात:काल)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३९० - **समर्थाई** । प्रतिपाल
ऐसो अलख अनँत अपारा,
तीन लोक जाको विस्तारा ॥टेक॥
निर्मल सदा सहज घर रहे,
ताको पार न कोई लहै ।
निर्गुण निकट सब रह्यो समाइ,
निश्चल सदा न आवै जाइ ॥१॥
अविनाशी है अपरँपार,
आदि अनन्त रहे निरधार ।
पावन सदा निरन्तर आप,
कला अतीत लिपत नहिं पाप ॥२॥
समर्थ सोई सकल भरपूर,
बाहर भीतर नेड़ा न दूर ।
अकल आप कलै नहिं कोई,
सब घट रह्यो निरंजन होई ॥३॥
अवरण आपैं अजर अलेख,
अगम अगाध रूप नहिं रेख ।
अविगत की गति लखी न जाइ,
दादू दीन ताहि चित लाइ ॥४॥
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प्रभु की सामर्थ्य बता रहे हैं - यह त्रिलोकी जिनका विस्तरित विराट रूप है, वे प्रभु ऐसे अनन्त अपार हैं कि - उनका वास्तविक स्वरूप मन इन्द्रियों से नहीं देखा जाता ।
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वे निर्मल हैं, सदा सहजावस्था रूप घर में रहते हैं, उनका पार कोई भी नहीं पाता । वे निर्गुण हैं, सबके समीप और सब में समाये हुये हैं । सदा निश्चल रहते हैं । व्यापक होने से उनमें जाना - आना नहीं बनता ।
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वे सृष्टि के आदि और अन्त में भी निश्चय पूर्वक अविनाशी तथा अपरँपार रूप से रहते हैं । वे सदा पवित्र, निरन्तर कला विभाग से रहित रहते हैं, पाप से लिपायमान नहीं होते ।
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वे समर्थ सब में परिपूर्ण हैं; बाहर भीतर एक रस हैं, सबके आत्म - स्वरूप होने से समीप वो दूर नहीं कहे जा सकते । वे स्वयँ निराकार हैं, इससे कालादि कोई भी उन्हें नष्ट नहीं कर सकते । माया रहित होकर भी सबके अन्त:करण में आत्म रूप से स्थित हैं ।
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उनका कोई रँग नहीं । परिवर्तन बिना स्वयँ ही जरा रहित हैं । लेख - बद्ध नहीं हो सकते । अगम अगाध हैं, रूप - रेखा रहित हैं । जिन इन्द्रियों के अविषय प्रभु की सामर्थ्य अपार है, उनकी सीमा देखी नहीं जा सकती । मैं दीन तो उन प्रभु में ही चित्त लगावे रहता हूं ।
(क्रमशः)

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