शनिवार, 10 अक्टूबर 2020

= *अपलक्षण अपराध का अंग १२८(१/४)* =

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*आपै मारै आपको, आप आप को खाइ ।*
*आपै अपना काल है, दादू कहि समझाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*अपलक्षण अपराध का अंग १२८*
इस अंग में अपने ही कुलक्षण रूप अपराध संबंधी विचार कर रहे हैं ~
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हिरन१ हिराना२ आप सौं, सुण्या वधिक का नाद ।
रज्जब तन मन यूं गम्या३, का शिर दे अपराध ॥१॥
मृग१ जब व्याध की बीणा का शब्द सुनता है तब आप ही अपने को भूल२ जाता है, इस प्रकार अपने शरीर को खो३ देता है, तब दोष किसे दे । वैसे ही मानव नारी आदि के शब्द सुनकर अपने मन को खो देता है तब दोष किसके शिर पर लगाये ? पहले तो अपना ही अपराध है ।
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यथा मीन मिल स्वाद को, स्वारथ काल हि खाय ।
तैसे रज्जब हम भये, दोष किसे दें जाय ॥२॥
जैसे मच्छी स्वाद के वश होकर मच्छी पकड़ने के कांटे पर लगे आटे आदि को निगलती है तब मारी जाती है । वैसे ही हम मानव हैं, स्वार्थ के वश होने से हमें काल खाता है, यह हमारा ही अपराध है दोष किसे दें ।
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ज्यों भौंरा१ मिलि२ वास३ को, कमल बँधाणा आणि४ ।
त्यों रज्जब हम होय कर हम हि हमारी हिणि ॥३॥
जैसे भ्रमर१ सुगंध३ में मिल२ कर अर्थात सुगंध की आसक्ति द्वारा आकर४ कमल में बंध जाता है, वैसे ही हम मानव लोग नासिका इन्द्रिय के अधीन होकर हम ही हमारी हानि कर रहे हैं ।
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ज्यों दीपक को देखि करि, पड़ि पतंग जरि जाय ।
तैसे रज्जब हम भये, जे१ देख्या निरताय२ ॥४॥
जैसे दीपक को देखकर पतंगा उसमें पड़कर जल जाता है, यदि१ विचार२ करके देखा जाय तो वैसे ही हम मानव लोक रूप के आधीन होकर उसकी चिन्तन रूप ज्वाला में जल रहे हैं ।
(क्रमशः)

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