रविवार, 4 अक्टूबर 2020

= *कुसंग सुसंग का अंग १२७(१/४)* =

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*मीठे मांही राखिये, सो काहे न मीठा होइ ।*
*दादू मीठा हाथ ले, रस पीवै सब कोइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*कुसंग सुसंग का अंग १२७* 
इस अंग में कुसंग सुसंग संबंधी विचार प्रकट कर रहे हैं ~
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विमल वारि बादल सौं बर्षै, परै नगर पर आय ।
शहर विकार परसै जल मैला, पानी पिया न जाय ॥१॥
निर्मल जल बादल से बर्षा और नगर पर आ पड़े तब शहर के विकारों से मिल कर जल मलीन हो जाता है, पीने योग्य नहीं रहता । वैसे ही कुसंग से अच्छा नर भी बुरा बन जाता है संग के योग्य नहीं रहता ।
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पुनि वह सलिल जाय सरिता में, निर्मल नाम कहाई ।
त्यों रज्जब वपु वाइक मेला, अस्थल संग बिकाई ॥२॥
शहर के विकारों से मलीन हुआ जल भी नदी में चला जाता है तब "बहता पानी निर्मला" इस युक्ति के अनुसार उसका नाम पुन: निर्मल कहा जाता है, वैसे ही शरीर और वचनों का मिलन है, वे भी स्थान के संग बिकते हैं अर्थात अच्छे शरीर में अच्छे वचन मिलते हैं और बुरे शरीर में बुरे वचन मिलते हैं वा अच्छे स्थान में अच्छे वचन और अच्छे शरीर मिलते हैं और बुरे स्थान में दोनों बुरे मिलते हैं ।
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पुरुषों उपजै शील व्रत, सिंहल द्वीप सु थान ।
त्यों मथुरा जागै मदन, मन वच कर्म करि मान ॥३॥
सिंहल द्वीप में पुरुषों में ब्रह्मचर्य व्रत उत्पन्न होता है और मथुरा में काम जागता है, यह बात मन, वचन, कर्म से सत्य ही मानो ।
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अगिलों१ की पिछलों लहई, तन मन सोई ताक ।
कृष्ण कथा सुन मर्द ह्वै, हींज सु हनुमत हांक ॥४॥
पहले१ होने वालों की जो चर्या थी उसी को देखकर पीछे होने वालों ने तन मन से अपनाई है, देखो, कृष्ण की कथा सुनकर तो मर्द हो जाता है और हनुमान की हांक सुनकर हिजड़े हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

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