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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग भैरूँ २४(गायन समय प्रात:काल)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३८४ - **उपदेश** । त्रिताल
जप गोविन्द विसर जनि जाइ,
जन्म सुफल करिये लै लाइ ॥टेक॥
हरि सुमिरण सौं हेत लगाइ,
भजन प्रेम यश गोविन्द गाइ ।
मानुष देह मुक्ति का द्वारा,
राम सुमिर जग सिरज नहारा॥१॥
जब लग विषम व्याधि नहिं आई,
जब लग काल काया नहिं खाई ।
जब लग शब्द पलट नहिं जाई,
तब लग सेवा कर राम राई ॥२॥
अवसर राम कहसि नहिं लोई१,
जनम गया तब कहै न कोई ।
जब लग जीवै तब लग सोई,
पीछैं फिर पछतावा होई ॥३॥
सांई सेवा सेवक लागे,
सोई पावै जे कोई जागे ।
गुरुमुख भरम तिमिर सब भागे,
बहुरि न उलटे मारग लागे ॥४॥
ऐसा अवसर बहुरि न तेरा,
देख विचार समझ जिय मेरा ।
दादू हारि जीत जग आया,
बहुत भाँति कह - कह समझाया ॥५॥
३८४ - ३८५ में हितकर उपदेश कर रहे हैं - अरे मन ! गोविन्द का नाम जप, गोविन्द को भूलकर सँसार में क्यों भटक रहा है ? भगवान् के स्वरूप में वृत्ति लगा कर अपने जन्म को सफल कर ।
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हरि स्मरण से स्नेह लगाकर भजन कर, प्रेम से गोविन्द का यश गान कर । मनुष्य देह मुक्ति - महल का द्वार है, इसमें जगत् के रचने वाले राम का स्मरण कर ।
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जब तक शरीर में भयँकर रोग नहीं आये, शब्द न बदले अर्थात् वाणी विकल न हो और शरीर को काल न खाय, उससे पहले ही विश्व के राजा राम की भक्ति कर ले ।
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लोग१ राम भजन करने के समय में तो भजन करते नहीं, फिर जन्म व्यतीत हो जायगा तब अन्त समय में राम - राम कोई भी न कह सकेगा । जब तक सुख से जीते हैं, तब तक तो मोह निद्रा में सोते हैं, फिर पीछे वृद्धावस्था में दु:ख पड़ेगा तब पश्चात्ताप ही होगा ।
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जो कोई सेवक मोह निद्रा से जाग कर प्रभु की भक्ति में लगे हैं, वे ही प्रभु को प्राप्त करेंगे । गुरुमुख द्वारा सुने उपदेश से भ्रम रूप सम्पूर्ण अँधकार हृदय से भाग जाता है, तब प्राणी विपरीत मार्ग में नहीं जाता ।
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अरे मन ! विचार द्वारा समझ कर देख, ऐसा समय पुन: तेरे हाथ न लगेगा । मैंने तुझे बहुत प्रकार कह - कह कर समझाया है कि - तू जगत् में जीतने के लिए मनुष्य शरीर में आया है, फिर हार क्यों रहा है ? भजन - विचार करके मोह - दल को शीघ्र विजय कर ।
(क्रमशः)

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