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*दादू लै लागी तब जाणिये, जे कबहुँ छूट न जाइ ।*
*जीवत यों लागी रहै, मूवां मंझ समाइ ॥*
(श्री दादूवाणी ~ लै का अंग)
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*श्रीरामकृष्ण की कर्मत्याग की स्थिति । जगन्माता के साथ वार्तालाप*
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सायंकाल हुआ । आँगन में उत्तर-पश्चिम के कोने में श्रीरामकृष्ण खड़े हैं, वे समाधिस्थ हैं । काफी देर बाद उनका मन बाह्य जगत् में लौटा । श्रीरामकृष्ण की कैसी अद्भुत स्थिति है ! आजकल प्रायः समाधिमग्न रहते हैं । थोड़े ही उद्दीपन से बाह्यज्ञानशून्य हो जाते हैं । जब भक्तगण आते हैं, तब थोड़ा वार्तालाप करते हैं; अन्यथा सदा ही अन्तर्मुख रहते हैं । अब पूजा, जप आदि नहीं कर सकते ।
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समाधि भंग होने के बाद खड़े खड़े ही जगन्माता के साथ बातचीत कर रहे हैं । कह रहे हैं, “माँ, पूजा गयी, जप गया । देखना माँ ! कहीं जड़ न बना डालना । सेव्यसेवक-भाव में रखना माँ, जिससे बात कर सकूं, तुम्हारा नाम-गुण – संकीर्तन और गान कर सकूं । और शरीर में थोड़ा बल दो माँ ! जिससे थोड़ा चल फिर सकूँ, जहाँ पर तुम्हारी कथा होती हो, जहाँ पर तुम्हारे भक्तगण हों, उन स्थानों में जा सकूँ ।”
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श्रीरामकृष्ण ने आज प्रातःकाल कालीमन्दिर में जाकर जगन्माता के श्रीचरणकमलों पर पुष्पांजलि अर्पण की है । वे फिर जगन्माता के साथ बातचीत कर रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, ‘माँ, आज सबेरे चरणों में दो फूल चढ़ाए । सोचा, अच्छा हुआ, फिर बाह्य पूजा की ओर मन जा रहा है ! पर माँ, फिर ऐसा क्यों हुआ ? फिर जड़ की तरह क्यों बना डाल रही हो ?”
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भाद्रपद कृष्णा सप्तमी । अभी तक चन्द्रमा का उदय नहीं हुआ । रात्रि तमसाच्छन्न है । श्रीरामकृष्ण अभी भावाविष्ट हैं, इसी स्थिति में अपने कमरे के छोटे तख्त पर बैठे । फिर जगन्माता के साथ बात कर रहे हैं ।
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अब सम्भवतः भक्तों के सम्बन्ध में माँ से कुछ कह रहे हैं । ईशान मुखोयाध्याय की बात कह रहे हैं । ईशान में कहा था, ‘मैं भाटपाड़ा में जाकर गायत्री का पुरश्चरण करूँगा ।’ श्रीरामकृष्ण ने उनसे कहा था कि कलियुग में वेदमत नहीं चलता; जीव अन्नगतप्राण है, आयु कम है, देहबुद्धि, विषयबुद्धि सम्पूर्ण नष्ट नहीं होती । इसीलिए ईशान को मातृभाव से तन्त्रमत के अनुसार साधना करने का उपदेश दिया था, और ईशान से कहा था, ‘जो ब्रह्म हैं, वही माँ, वही आद्याशक्ति हैं ।’
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श्रीरामकृष्ण भावाविष्ट होकर कह रहे हैं, “फिर गायत्री का पुरश्चरण ! इस छत पर से उस छत पर कूदना । किसने उससे ऐसी बात कही है? अपने ही मन से कर रहा है । अच्छा, थोड़ा पुरश्चरण करेगा ।”
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(मास्टर के प्रति)- “अच्छा, मुझे यह सब क्या वायु के विकार से होता है अथवा भाव से ?”
मास्टर विस्मित होकर देख रहे हैं कि श्रीरामकृष्ण जगन्माता के साथ इस प्रकार बातचीत कर रहे हैं । वे विस्मित होकर देख रहे हैं, ईश्वर हमारे अति निकट, बाहर तथा भीतर हैं । अत्यन्त निकट हुए बिना श्रीरामकृष्ण धीरे धीरे उनके साथ बातचीत कैसे कर रहे हैं ?
(क्रमशः)

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