🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 सत्यराम सा 卐 🙏🌷
🦚 #श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
#हस्तलिखित०दादूवाणी सौजन्य ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ पीव पहिचान का अंग २० - ३०/३१)
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॥ जगत भुलावन ॥
सेवा का सुख प्रेम रस, सेज सुहाग न देइ ।
दादू बाहे दास को, कहै दूजा सब लेइ ॥३०॥
भगवान् सब ही भक्तों को हृदय शय्या पर विराजमान होकर भक्ति का प्रेम सुख नहीं देते किन्तु सांसारिक तुच्छ फल का प्रलोभन देकर बहका देते हैं । जो निष्काम भक्त हैं वे उन लौकिक वरदान आदि रूप तुच्छ फलों के लोभ में नहीं आते अतः वे ही उसको प्राप्त करते हैं । जैसे भागवत में लिखा है कि- हे प्रह्लाद हे श्रेष्ठ भक्त ! तुम्हारा कल्याण हो । मैं तुम पर प्रसन्न हूँ, यथेच्छ वरदान मांगलो ।
साधक अपने को नित्य सर्वगत अत्यन्त सूक्ष्म अन्दर और बाहर से रहित शून्य ब्रह्म से अभिन्न निजरूप जानकर पाप रहित होकर मुक्त हो जाता है । क्योंकि मैं मनुष्यों की कामना को पूर्ण करने वाला हूँ । हे आयुष्मन् ! मेरे दर्शन बहुत दुर्लभ है और मेरा दर्शन करके प्राणी संसार में दुःखी नहीं रह सकता है । इसलिये कल्याण की इच्छा वाले संपूर्ण कामनाओं के स्वामी मुझ परमात्मा को सर्वतोभावेन महाभाग्यवान् धीर पुरुष प्रसन्न करते हैं । इस तरह प्रलोभन देने पर भी प्रभु में एकान्त भक्ति होने के कारण असुर शिरोमणि प्रह्लाद भक्त ने वरदान नहीं चाहा ।
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लोहा माटी मिलि रह्या, दिन दिन काई खाइ ।
दादू पारस राम बिन, कतहुँ गया विलाइ ॥३१॥
जैसे लौहा मिट्टी में मिलकर जर्जरिभूत होकर नष्ट हो जाता है । वैसे ही यह जीवात्मा भी सतगुरुरूप पारसमणि को विना राम भक्ति को किये विना ही संसार में नष्ट हो रहा है ।
(क्रमशः)
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
#हस्तलिखित०दादूवाणी सौजन्य ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ पीव पहिचान का अंग २० - ३०/३१)
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॥ जगत भुलावन ॥
सेवा का सुख प्रेम रस, सेज सुहाग न देइ ।
दादू बाहे दास को, कहै दूजा सब लेइ ॥३०॥
भगवान् सब ही भक्तों को हृदय शय्या पर विराजमान होकर भक्ति का प्रेम सुख नहीं देते किन्तु सांसारिक तुच्छ फल का प्रलोभन देकर बहका देते हैं । जो निष्काम भक्त हैं वे उन लौकिक वरदान आदि रूप तुच्छ फलों के लोभ में नहीं आते अतः वे ही उसको प्राप्त करते हैं । जैसे भागवत में लिखा है कि- हे प्रह्लाद हे श्रेष्ठ भक्त ! तुम्हारा कल्याण हो । मैं तुम पर प्रसन्न हूँ, यथेच्छ वरदान मांगलो ।
साधक अपने को नित्य सर्वगत अत्यन्त सूक्ष्म अन्दर और बाहर से रहित शून्य ब्रह्म से अभिन्न निजरूप जानकर पाप रहित होकर मुक्त हो जाता है । क्योंकि मैं मनुष्यों की कामना को पूर्ण करने वाला हूँ । हे आयुष्मन् ! मेरे दर्शन बहुत दुर्लभ है और मेरा दर्शन करके प्राणी संसार में दुःखी नहीं रह सकता है । इसलिये कल्याण की इच्छा वाले संपूर्ण कामनाओं के स्वामी मुझ परमात्मा को सर्वतोभावेन महाभाग्यवान् धीर पुरुष प्रसन्न करते हैं । इस तरह प्रलोभन देने पर भी प्रभु में एकान्त भक्ति होने के कारण असुर शिरोमणि प्रह्लाद भक्त ने वरदान नहीं चाहा ।
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लोहा माटी मिलि रह्या, दिन दिन काई खाइ ।
दादू पारस राम बिन, कतहुँ गया विलाइ ॥३१॥
जैसे लौहा मिट्टी में मिलकर जर्जरिभूत होकर नष्ट हो जाता है । वैसे ही यह जीवात्मा भी सतगुरुरूप पारसमणि को विना राम भक्ति को किये विना ही संसार में नष्ट हो रहा है ।
(क्रमशः)

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