शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2020

*हाजरा को उपदेश – घृणा व निन्दा छोड़ दो*

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*दादू निन्दा किये नरक है, कीट पड़ैं मुख मांहि ।*
*राम विमुख जामै मरै, भग-मुख आवै जाहि ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ निन्दा का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*हाजरा को उपदेश – घृणा व निन्दा छोड़ दो*
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हाजरा महाशय कभी कभी किसी के सम्बन्ध में घृणा प्रकट करते थे ।
श्रीरामकृष्ण(राम आदि भक्तों के प्रति)- कामारपुकुर में किसी मकान पर मैं अक्सर जाया करता था । उस घर के लड़के मेरी ही बराबरी के थे, वे लड़के उस दिन यहाँ आए थे और दो-तीन दिन रहे भी । हाजरा की तरह उनकी माँ सब से घृणा करती थी । अन्त में उसके पैर में न जाने क्या हो गया । पैर सड़ने लगा । कमरे में इतनी दुर्गन्ध हुई कि लोग अन्दर तक नहीं जा सकते थे ।
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“इसीलिए मैंने हाजरा से यह बात कही और उसे चेतावनी दे दी कि किसी की निन्दा न करो ।”
दिन के चार बजे का समय हुआ । श्रीरामकृष्ण मुँह-हाथ धोने के लिए झाऊतल्ले की ओर गए । उनके कमरे के दक्षिणपूर्ववाले बरामदे में दरी बिछायी गयी । श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले से लौटकर उस पर बैठे । राम आदि उपस्थित हैं । अधर सेन जाति के सुनार हैं । उनके घर राखाल ने अन्नग्रहण कर लिया, इसलिए रामबाबू ने कुछ कहा है । अधर परम भक्त हैं । यही बातें हो रही हैं ।
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एक भक्त हँसी हँसी में सुनारों में से किसी किसी के स्वभाव का वर्णन कर रहे हैं । श्रीरामकृष्ण हँस रहे हैं – स्वयं कोई राय प्रकट नहीं कर रहे हैं ।
(क्रमशः)

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