शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

= *मूढ कर्मी असाध्य रोग का अंग १३०(१/४)* =

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*एक शब्द सब कुछ कह्या, सतगुरु सिष समझाइ ।*
*जहाँ लाया तहँ लागै नहीं, फिर फिर बूझै आइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*मूढ कर्मी असाध्य रोग का अंग १३०*
इस अंग में मूर्खता पूर्वक कर्म करनेवाले के असाध्य रोग का परिचय दे रहे हैं ~
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सूता शब्द जगाइये, जागत पुनि सो जाय ।
रज्जब मन ऐसी गही, तासौं कछु न बसाय ॥१॥
सोते हुये मानव को आवाज से जगाया जाता है किन्तु जागता हो और न बोलने की इच्छा हो तो शब्द सुनकर पुन: सो जाता है । ऐसी बात जिसने मन में ग्रहण कर रक्खी हो उससे कुछ भी वश नहीं चलता अर्थात उसका जन्मादि रोग असाध्य है, मिट नहीं सकता ।
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सदगुरु की समझै नहीं, अपणे उपजै नाँहिं ।
तो रज्जब क्या कीजिये, बुरी व्यथा मन माँहिं ॥२॥
सदगुरु की वाणी तो समझता नहीं और अपने हृदय में हितकर विचार उत्पन्न होते नहीं तब क्या किया जाय, उसके मन में तो बड़ा बुरा असाध्य रोग लगा है ।
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सदगुरु शब्द न मान ही, चलै मन मुखी भाय१ ।
औषधि गई अहार पड़ि२, व्यथा३ बीच४ मरि जाय ॥३॥
जैसे किसी व्यक्ति की औषधि भोजन रूप२ हो जाय, रोग को नष्ट न करे तब वह रुग्णावस्था३ में४ ही मर जाता है वैसे ही जो सदगुरु के शब्द तो मानता नहीं और अपने मन मुखी स्वभाव१ से ही चलता है, उसका संसार-रोग नष्ट नहीं होता वह उसी स्थित में मर कर कर्मानुसार पुन: जन्मता है ।
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मींच विसारी नीच ने, ताहि कौन उपदेश ।
रज्जब रोग असाध्य को, लगे न औषधि लेश ॥४॥
जैसे असाध्य रोग के औषधि किंचित मात्र भी नहीं लगती, वैसे ही जो नीच मानव मृत्यु को भूल जाता है उसको कौन सा उपदेश लगता है ? अर्थात कोई भी नहीं लगता ।
(क्रमशः)

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