सोमवार, 5 अक्टूबर 2020

पीव पहिचान का अंग २० - ११/१७

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ पीव पहिचान का अंग २० - ११/१७)
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*दादू सबका साहिब एक है, जाका परगट नांव ।*
*दादू सांई शोध ले, ताकी मैं बलि जांव ॥११॥*
जो मत मतान्तर का परित्याग करके सर्वप्रसिद्ध ईश्वर की ही उपासना करते हैं, वे धन्य हैं । मैं भी उनकी बलिहारी लेता हूं ।
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*साचा सांई शोध कर, साचा राखी भाव ।*
*दादू साचा नाम ले, साचे मारग आव ॥१२॥*
सत्य परमात्मा का मन द्वारा संशोधन करके सत्य भावना से जो परमेश्वर का नाम जपता है, वह सत्य मार्गानुयायी है ।
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*साचा सतगुरु शोध ले, साचे लीजे साध ।*
*साचा साहिब शोध कर, दादू भक्ति अगाध ॥१३॥*
*जामै मरै सो जीव है, रमता राम न होइ ।*
*जामण मरण तैं रहित है, मेरा साहिब सोइ ॥१४॥*
मेरा स्वामी जन्म मरण से रहित हैं । क्योंकि जन्म मरण वाला तो जीव होता है, जो सर्वकाल में व्यापकरूपेण रहता है उसका जन्म मरण संभव ही नहीं है । 
कठोपनिषद् में लिखा है कि- नित्यज्ञान स्वरूप आत्मा न तो स्वयं किसी से हुआ है और न कुछ इसमें हुआ है । अर्थात् वह कार्यकारण भाव से रहित है । किन्तु अजन्मा नित्य सदा एक रस रहने वाला और पुरातन क्षयवृद्धि से रहित है । शरीर के नष्ट होने पर भी इसका नाश नहीं होता ।
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*उठै न बैसै एक रस, जागै सोवै नांहि ।*
*मरै न जीवै जगतगुरु, सब उपज खपै उस मांहि ॥१५॥*
ब्रह्म न उठता है और न वह बैठता है, न जागता, न सोता, न जन्मता न मरता किन्तु एक रस रहता है । उसमें जगत् हो होकर बुदबुदे की तरह विलीन हो जाता है । अतः ब्रह्म सर्व क्रियाकारक भेदशून्य सर्वाधिष्ठान है ।
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*ना वह जामै ना मरै, ना आवै गर्भवास ।*
*दादू ऊंधे मुख नहीं, नरक कुंड दस मास ॥१६॥*
*कृत्रिम नहीं सो ब्रह्म है, घटै बधै नहिं जाइ ।*
*पूरण निश्‍चल एक रस, जगत न नाचे आइ ॥१७॥*
ब्रह्म न जन्मता और न मरता है क्योंकि वह अशरीरी है । जन्मना मरणा यह शरीर धर्म है । अतएव वह गर्भवास के दुःखों का अनुभव नहीं करता और न घटता बढ़ता है । उसका बनाने वाला कोई नहीं प्रत्युत वह ही सबका बनाने वाला है और न जीव की तरह वह पाप पुण्य से युक्त होता । क्योंकि वह असंग और वेद में बतलाया है कि उसको कृताकृत स्पर्श भी नहीं कर सकते और सर्वव्यापक होने से वह जीव की तरह लोकान्तर में नहीं जाता । किन्तु वह सर्वदा एकरस चिन्मात्र सर्वगत है । 
गीता में कहा है कि- वह जनम मरण धर्मों से रहित नित्य अज सनातन पुराण पुरुष है । शरीरों के नाश से भी उसका नाश नहीं होता ।
उपदेशसाहस्त्री में कहा है कि- यह आत्मा आकाश की तरह सर्व के शरीर में साक्षी रूपसे हृदय में निवास करता है । अतः इससे भिन्न कोई दूसरा दृष्टा नहीं है अतः ईश्वर एक ही है । जैसे विशुद्ध आकाश कहीं भी आसक्त नहीं होता न किसी भी धर्म से लिप्त होता, वैसे ही आत्मा सब भूतों में समभाव से रहता हुआ भी अलिप्त है । और अजर अमर अभयरूप है ।
(क्रमशः)

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