सोमवार, 5 अक्टूबर 2020

*आद्याशक्ति तथा अवतार-लीला*

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*नाना विधि पिया राम रस, केती भाँति अनेक ।*
*दादू बहुत विवेक सौं, आत्म अविगत एक ॥*
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
*आद्याशक्ति तथा अवतार-लीला । वेद, पुराण एवं तन्त्रों का समन्वय*
“अवतार-लीला- ये सब चित्शक्ति के ऐश्वर्य हैं । जो ब्रह्म हैं, वे ही फिर राम, कृष्ण तथा शिव हैं ।”
ईशान- हरि और हर, एक ही धातु है, केवल प्रत्यय का भेद है । (सभी हँस पड़े ।)
श्रीरामकृष्ण- हाँ, एक के अतिरिक्त दो कुछ भी नहीं है । वेद में कहा है – ॐ सच्चिदानन्दं ब्रह्म; पुराण में कहा है – ॐ सच्चिदानन्दः कृष्णः और तन्त्र में कहा है - ॐ सच्चिदानन्दः शिवः ।
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“उस चित्शक्ति ने महामाया के रूप में सभी को अज्ञानी बना रखा है । अध्यात्मरामायण में है, राम के दर्शन जितने ऋषियों ने किए वे सभी एक बात कहते थे, - ‘हे राम, हमें अपनी भुवनमोहिनी माया द्वारा मुग्ध न करो ।’*(*अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तें मुह्यन्ति जन्तवः । - गीता, ५/१५)
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ईशान- यह माया क्या है ?
श्रीरामकृष्ण- जो कुछ देखते हो, सुनते हो, सोचते हो, सभी माया है । एक बात में कहना हो तो, कामिनी-कांचन ही माया का आवरण है ।
“पान खाना, तम्बाकू पीना, तेल मालिश करना – इनमें दोष नहीं है । केवल इन्हीं का त्याग करने से क्या होगा ? कामिनी-कांचन के त्याग की आवश्यकता है । वही त्याग है ! गृहस्थ लोग बीच बीच में निर्जन स्थान में जाकर साधन-भजन कर भक्ति प्राप्त करके मन से त्याग करें । संन्यासी बाहर भीतर दोनों ओर से त्याग करें ।
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“केशव सेन से मैंने कहा था, ‘जिस कमरे में जल का घड़ा और इमली का अचार है उसी कमरे में यदि सन्निपात का रोगी रहे तो भला वह कैसे अच्छा हो सकता है ? बीच बीच में निर्जन स्थान में जाना ही चाहिए ।’
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एक भक्त- महाराज, नवविधान ब्राह्मसमाज किस प्रकार है – मानो खीचड़ी जैसा !
श्रीरामकृष्ण- कोई कोई कहते हैं आधुनिक । मैं सोचता हूँ, क्या ब्राह्मसमाजवालों का ईश्वर दूसरा है ? कहते हैं नवविधान नया विधान; सो होगा । जिस प्रकार छः दर्शन हैं, षट्दर्शन, उसी प्रकार एक और कुछ होगा ।
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“परन्तु निराकारवादियों की भूल क्या है जानते हो ? भूल यह है कि वे कहते हैं, ईश्वर निराकार हैं, और बाकी सारे मत गलत हैं ।’
“मैं जानता हूँ, वे साकार निराकार दोनों ही हैं, और भी कितने प्रकार के बन सकते हैं ! वे सब कुछ बन सकते हैं ।”
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(ईशान के प्रति) – “वही चित्शक्ति, वही महामाया चौबीस तत्त्व बनी हुई है । मैं ध्यान कर रहा था, ध्यान करते करते मन चला गया । रस के के घर में । रस के मेहतर है । मन से खा, ‘अरे, रह, वहीँ पर रह’ । माँ ने दिखा दिया, उसके घर में जो लोग घूम रहे हैं, वे बाहर का आवरण मात्र हैं, भीतर वही एक कुलकुण्डलिनी, एक षट्चक्र है ।
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“वह आद्याशक्ति स्त्री है या पुरुष ? मैंने उस देश में देखा, लाहाओ के घर पर कालीपूजा हो रही है । माँ के गले में जनेऊ दिया है । एक व्यक्ति ने पूछा, ‘माँ को जनेऊ क्यों है ?’ जिसके घर में पूजा है उसने कहा, ‘भाई, तूने माँ को ठीक पहचाना है, परन्तु मैं तो कुछ भी नहीं जानता कि माँ पुरुष है या स्त्री !’
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“इस प्रकार कहा जाता है कि महामाया शिव को निगल गयी । माँ के भीतर षट्चक्र का ज्ञान होने पर शिव माँ की जाँघ में से निकल आए । फिर शिव ने तन्त्रों की रचना की ।”
“उस चित्शक्ति के, इस महामाया के शरणागत होना चाहिए ।”
ईशान- आप कृपा कीजिए ।
(क्रमशः)

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