🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु* 🌷
*क्या मुँह ले हँस बोलिये, दादू दीजे रोइ ।*
*जन्म अमोलक आपना, चले अकारथ खोइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ मन का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु*, *मानव देह*
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नर तन पाकर भी न भजें, हरि उनको धिक्कार ।
नाचत वेश्या ने कहा, इनको ही उच्चार ॥८५॥
अधिकमास का समय था, नगर में स्थान - स्थान पर सत्संग, कीर्तन आदि हो रहे थे । सत्संग आदि से उपराम मलिन मन वाले मनुष्यों ने एक बाग में वेश्या का नाच आरम्भ कराया । संकीर्तन जानकर एक संत वहां चले गये और देख कर यह सोचते हुये कि सत्संग स्थान तो खाली पड़े हुए हैं और यहां बहुत मनुष्य जमा हैं बोले -
सवैया -
परिपूरण पाप के कारण से,
भगवन्त कथा न रुचे जिनको ।
तिन एक कुनारि बुलाय लई,
नचवावत है निशि को दिन को ॥
(यह सुनकर मृदंग वाला बोला)
मिरदंग कहै धिक है धिक है,
(तब मंजीरे वाले ने पूछा)
मंजीर कहै किनको किनको ।
तब हाथ उठाय के नारि कहै,
इनको इनको इनको इनको ॥

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