शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2020

(“पंचमोल्लास” ३१/३३)

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“पंचमोल्लास” ३१/३३)
*अंतर जांमी कीयो वासू,*
*अहनिस कीजै ब्रह्म विलासू ।* 
*माया मोह तज्यौ दुख द्वंदू,*
*उर मांहि पैठै परमानंदू ॥३१॥* 
अर्न्तयामी हरि ने उनके हृदय में वास किया और रात दिन ब्रह्म के आनंद में ही विलास आनंद कर रहे हैं । उन्होंने माया मोह के द्वंद का त्याग कर दिया और हृदय में सदा परमानंद ब्रह्म को धारण किया ॥३१॥ 
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*निस वासुर जो हरि कहे, त्यागे सब जंजाल ।* 
*रामू ऐसे राम कहि, पल में करे निहाल ॥३२॥* 
जो साधक संत रात दिन हरि का जाप करते हैं और संसार के राग द्वेष लोभादि जंजालों को छोड़ देते हैं रामूजी कहते हैं इस प्रकार यदि भजन किया जाय तो पल में निरंजन राम निहाल कर देते हैं सब कुछ दे देते हैं ॥३२॥ 
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*वरणों कहां जु संत की, करणी अगम अगाध ।* 
*ब्रह्म विलासी सकल जौ, अविगति करे अराध ॥३३॥* 
संतों की अगम और अगाध करणियों का कहां तक वर्णन करूं अर्थात् वर्णनातीत है । वे संत ब्रह्म में विलास कर आनंद मग्न रहते हैं और अविगत ब्रह्म की आराधना करते रहते हैं ॥३३॥
(क्रमशः)

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