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🦚 #श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका 🦚
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग २१ - १३/१६)
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*दादू मार्ग महर का, सुखी सहज सौं जाइ ।*
*भवसागर तैं काढ कर, अपणे लिये बुलाइ ॥१३॥*
जो साधक भगवान् की कृपा प्राप्त करके विश्वासपूर्वक सहज योग के मार्ग से चलते हैं वे इस भवसागर को पार करके भगवान् के सानिध्य में रहते हुए भगवद्रूप हो जाते हैं ।
लिखा है कि- बुद्धिमान् मनुष्य भगवान् की शरण लेकर अनन्त क्लेशमय तथा भयंकर इस संसार सागर को पार कर जाते हैं ।
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*दादू जे हम चिन्तवैं, सो कछु न होवै आइ ।*
*सोई कर्त्ता सत्य है, कुछ औरै कर जाइ ॥१४॥*
जीव जो जो कर्म करना चाहता है तो उसके वे-वे काम संपन्न नहीं होते जैसा वह चाहता है । अतः ईश्वर ही सच्चा कर्ता है । यदि वह चाहे तो सर्वकार्य जीव के अपने आप ही होते जाते हैं ।
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*एकौं लेइ बुलाइ कर, एकौं देइ पठाइ ।*
*दादू अद्भुत साहिबी, क्यों ही लखी न जाइ ॥१५॥*
भगवान् पापी पर भी दया करके उसको पवित्र बनाकर अपने पास बुला लेते हैं । जैसे अजामिल पर दया करके अपना सान्निध्य प्रदान कर दिया । कभी कभी भक्तों को संसार के कल्याण के लिये संसार में भेज देते हैं । जैस जय विजय को । अथवा स्वयं ही संसार के कल्याण के लिये अपनी माया से अवतार लेकर आ जाते हैं ।
जैसे गीता में कहा है कि- जब जब धर्म की हानि और अधर्म की अभिवृद्धि होने लगती है तब तब मैं धर्म की रक्षा के लिये अवतार लेता हूँ । अन्यथा निरपेक्ष भगवान् को संसार में आने की क्या आवश्यकता है? केवल कृपा ही कारण है ।
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*ज्यों राखै त्यों रहेंगे, अपने बल नांही ।*
*सबै तुम्हारे हाथ है, भाज कत जांही ॥१६॥*
हे परमेश्वर ! जैसी आपकी इच्छा होती है, जीव वैसे ही सब व्यवहार करता है । न कि अपनी इच्छा से । क्योंकि प्राणी मात्र आपके अधीन है । आप को छोड़कर भागे तो कहां जाय ? क्योंकि आप सर्वव्यापक हैं ।
(क्रमशः)

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