🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग भैरूँ २४(गायन समय प्रात:काल)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
३८८ - **मन प्रति शूरातन** । धीमा ताल
रहु रे रहु मन मारूँगा, रती रती कर डारूँगा ॥टेक॥
खँड खँड कर नाखूँगा, जहां राम तहं राखूँगा ॥१॥
कह्या न मानै मेरा, शिर भानूँगा तेरा ॥२॥
घर में कदे न आवै, बाहर को उठ धावै ॥३॥
आतम राम न जानै, मेरा कह्या न मानैं ॥४॥
दादू गुरुमुख पूरा, मन सौं झूझै शूरा ॥५॥
मन को जीतने के लिए शौर्यता दिखा रहे हैं - अरे मन ! तू कुमार्ग में जाने से रुक जा, नहीं रुकेगा तो मैं तुझे रत्ती - रत्ती कर डालूँगा अर्थात् सँकल्प ही नहीं बनने दूँगा ।
.
वैराग्य, भजन विचारादि साधनों से मैं तेरे टुकड़े - टुकड़े कर डालूँगा । इस प्रकार तुझे कमजोर करके ध्यानावस्था में जहां अष्टदल - कमल पर राम का दर्शन होता है वहां ही तुझे स्थिर रक्खूँगा ।
.
तू मेरा कहा नहीं मानता, याद रख, मैं सँयम - दँड से तेरा चपलता रूप शिर फोड़ डालूँगा ।
.
तू अन्तर्मुखता रूप घर में कभी भी नहीं आता और बाह्य विषयों में बारँबार दौड़ जाता है ।
.
आत्म - स्वरूप राम को जानने का उपाय भी नहीं करता । तुझे बारँबार कहने पर भी तू मेरा कहा नहीं मानता ।
.
इस प्रकार गुरु मुख से सुने उपदेश में पूर्ण रूप से चलने वाला वीर साधक मन से युद्ध करता रहता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें