🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *#श्री०रज्जबवाणी* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*दादू साधु संगति पाइये, राम अमीफल होइ ।*
*संसारी संगति पाइये, विषफल देवै सोइ ॥*
=================
*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*कुसंग सुसंग का अंग १२७*
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दर्पण में द्विप१ छोटा दीसै, मोटा२ फटक३ पषाण ।
ऐसे निगुण४ सगुण सौं मिलतों, लघु दीरघ सु बखाण५ ॥१७॥
दर्पण में हाथी१ छोटा दिखता है और बिल्लौर३ पत्थर में बड़ा२ दीखता है । वैसे ही निगुणे४(कृतध्न) से मिलने पर प्राणी छोटा कहा जाता है और गुणवान से मिलने पर बड़ा कहा५ जाता है ।
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गंधी हाथ विसालवा१, सींगी हाथ हजाम३ ।
वहि२ सुगंध संगति सदा, वहिं४ शोणित सब ठाम ॥१८॥
इत्र-फूलेल बेचने वाले गंधी के हाथ में इत्र मापने की नलिका१ होती है, वह२ सदा सुगंध की संगति में रहती है और हजामत बनाने वाले नाई३ के हाथ में सींगी रहती है, उसमें४ सब स्थानों मे रक्त ही भरा जाता है । वैसे ही सुसंग से अच्छाई आती है और कुसंग से बुराई आती है ।
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श्रवण सोत१ व्है शब्द जल, काया कूप में आय ।
कपट कामना करंक२ पड़ै, रज्जब पिया न जाय ॥१९॥
स्रोत१ से कूप में जल आता है किन्तु जल कूप में शरीर-पजंर२ पड़ जाय तो उसका जल नहीं पान किया जाता, वैसे ही श्रवणों से शरीर में शब्द आते हैं किन्तु हृदय में कपट और कामना आ जाय तो उस शरीर के शब्द ग्राह्य नहीं होते ।
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इक निवान१ नीर खित२ खार मय, एक अंभ३ खित४ ख्वार५ ।
इक पियूष६ प्राणी पहम७, परिहरि९ पियौ८ विचार ॥२०॥
एक खारे जल के जलाशय१ के जल से पृथ्वी२ खार मय हो जाती है, एक जल३ पृथ्वी४ से खराब५ होजाता है, एक पृथ्वी७ का जल अमृत६ तुल्य है, अत: अयोग्य को त्याग कर पीने योग्य को ही पीना चाहिये । वैसे ही प्राणियों का विचार है, एक कु मानव से बहुत से मानव खराब हो जाते हैं, एक सु मानव समूह से खराब हो जाता है, एक अपनी अमृतमय स्थिति में रहते हुए दूसरों को भी ज्ञानामृत का पान कराता है । अत: अन्य को त्याग९ कर विचार पूर्वक ज्ञानामृत का ही पान८ करो ।
(क्रमशः)
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*संसारी संगति पाइये, विषफल देवै सोइ ॥*
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*कुसंग सुसंग का अंग १२७*
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दर्पण में द्विप१ छोटा दीसै, मोटा२ फटक३ पषाण ।
ऐसे निगुण४ सगुण सौं मिलतों, लघु दीरघ सु बखाण५ ॥१७॥
दर्पण में हाथी१ छोटा दिखता है और बिल्लौर३ पत्थर में बड़ा२ दीखता है । वैसे ही निगुणे४(कृतध्न) से मिलने पर प्राणी छोटा कहा जाता है और गुणवान से मिलने पर बड़ा कहा५ जाता है ।
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गंधी हाथ विसालवा१, सींगी हाथ हजाम३ ।
वहि२ सुगंध संगति सदा, वहिं४ शोणित सब ठाम ॥१८॥
इत्र-फूलेल बेचने वाले गंधी के हाथ में इत्र मापने की नलिका१ होती है, वह२ सदा सुगंध की संगति में रहती है और हजामत बनाने वाले नाई३ के हाथ में सींगी रहती है, उसमें४ सब स्थानों मे रक्त ही भरा जाता है । वैसे ही सुसंग से अच्छाई आती है और कुसंग से बुराई आती है ।
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श्रवण सोत१ व्है शब्द जल, काया कूप में आय ।
कपट कामना करंक२ पड़ै, रज्जब पिया न जाय ॥१९॥
स्रोत१ से कूप में जल आता है किन्तु जल कूप में शरीर-पजंर२ पड़ जाय तो उसका जल नहीं पान किया जाता, वैसे ही श्रवणों से शरीर में शब्द आते हैं किन्तु हृदय में कपट और कामना आ जाय तो उस शरीर के शब्द ग्राह्य नहीं होते ।
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इक निवान१ नीर खित२ खार मय, एक अंभ३ खित४ ख्वार५ ।
इक पियूष६ प्राणी पहम७, परिहरि९ पियौ८ विचार ॥२०॥
एक खारे जल के जलाशय१ के जल से पृथ्वी२ खार मय हो जाती है, एक जल३ पृथ्वी४ से खराब५ होजाता है, एक पृथ्वी७ का जल अमृत६ तुल्य है, अत: अयोग्य को त्याग कर पीने योग्य को ही पीना चाहिये । वैसे ही प्राणियों का विचार है, एक कु मानव से बहुत से मानव खराब हो जाते हैं, एक सु मानव समूह से खराब हो जाता है, एक अपनी अमृतमय स्थिति में रहते हुए दूसरों को भी ज्ञानामृत का पान कराता है । अत: अन्य को त्याग९ कर विचार पूर्वक ज्ञानामृत का ही पान८ करो ।
(क्रमशः)

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