शनिवार, 3 अक्टूबर 2020

*७. हैरान कौ अंग ~ ६९/७२*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*७. हैरान कौ अंग ~ ६९/७२*
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आदि अंत अविगत अकल, अपणां आप लहंत ।
कहि जगजीवन साध सब, असतुति विरद कहंत ॥६९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि आरम्भ अंत न जाना जा सकने योग्य स्वयंभू है संत कहते हैं कि सभी साधु उनकी विरद या महिमा गाते हैं ।
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आदि अंत उतपति सकल, अविगति अकल अगाध ।
कहि जगजीवन जांणि जस, सहज करै सब साध ॥७०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि आदि अंत उत्पत्ति व सब कला रहित होना ज्ञान से भी परे थाह न पाया जाने योग्य उन प्रभु के यश व महत्ता को सब साधु जन जानते हैं ।
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आदि अंत मधि को लहै, कौंण करै परमाण ।
कहि जगजीवन आदि अंत मधि, सबद मांहि सोइ जांण ॥७१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि आरम्भ अंत और मध्य में जाकर कौन प्रमाणित करता है कि आदि मध्य और अंत में प्रभु नाम का शब्द ही सबमें है ऐसा ही जानें ।
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आदि अंत मधि कोइ न जांणै, जे जांणै तो रांम ।
कहि जगजीवन साध सब, पूरि कहै सब ठांम ॥७२॥
आरम्भ अंत और मध्य तक कोइ नहीं जानता जो कुछ भी जानते हैं वे राम ही जानते हैं संत कहते हैं कि साधु सब स्थान पर पूर्ण रुप से भरा हुआ कहते हैं ।
(क्रमशः)

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