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🦚 *#श्रीसंतगुणसागरामृत०२* 🦚
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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थोल्लास” ७६/७८)*
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*सकल साथ ऊपजी मन मांही,*
*संत छाड़ि अव अनत न जांही ।*
*ये संत हैं जीवन मूरी,*
*हे देव तुम्ह रहे हजूरी ॥७६॥*
सभी आदमियों के मन में एक साथ यह बात उपजी कि अब संत को छोड़ कर अन्यत्र नहीं जावेंगे । ये संत हमारे जीवन की रक्षा करने वाले हैं, हे देव हम तुम्हारी शरण हाजिरी में रहेंगे ॥७६॥
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*अबै गुरुजी चरनौं चेरो,*
*कृपा करो हम राखो नेरो ।*
*दयावंत अरु पर उपगारी,*
*सीतल वचन सू निर्मल सारी ॥७७॥*
हे गुरुदेव अब हम आपके चरणों के सेवक हैं कृपाकर हमें अपनी शरण में पास में ही रखो । आप बड़े दयालु पर उपकारी शीतल मधुर वचन बोलने वाले और तन मन वचन से निर्मल हैं ॥७७॥
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*कहे उपदेस जु हित कर बैन,*
*कर्म विवर्जित उपज्यो चैन ।*
*नख सिख सकल सीतल भई देही,*
*कृपा कीनी राम सनेही ॥७८॥*
संतजी ने उन अपने सेवकों को मन वचन के लिये हितकर वचन उपदेश कहे जिसमें किसी प्रकार का कर्म का बन्धन नहीं था । उपदेश सुनकर सेवकों के सम्पूर्ण शरीर शीतल हो गया अर्थात् किसी प्रकार की बैचेनी नहीं रही, राम के प्रेमियों ने उन सब जीवों पर कृपा की ॥७८॥
(क्रमशः)

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