शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग भैरूँ २४(गायन समय प्रात:काल)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३८२ - **करुणा विनती** । त्रिताल
तुम बिन कहु क्यों जीवन मेरा,
अजहूं न देख्या दर्शन तेरा ॥टेक॥
होहु दयाल दीन के दाता,
तुम पति पूरण सब विधि साचा ॥१॥
जो तुम करो सोइ तुम्ह छाजै,
अपने जन को काहे न निवाजै ॥२॥
अकरन करन ऐसैं अब कीजै,
अपनो जान कर दर्शन दीजै ॥३॥
दादू कहै सुनहु हरि सांई,
दर्शन दीजै मिलो गुसांई ॥४॥
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दु:खपूर्वक दर्शनार्थ विनय कर रहे हैं - हे प्रभो ! मैं अति प्रयत्न करके भी अभी तक आपका दर्शन न कर सका, तो कहिये, आपके बिना अब मेरा जीवित रहना कैसे संभव होगा ?
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हे स्वामिन् ! आप सब में परिपूर्ण और सब प्रकार सत्य का पालन करने वाले हैं, दीनों के लिए देवता कहलाते हैं । अत: आप मुझ पर दयालु होकर अपनी दयालुता का यथार्थ परिचय दीजिये ।
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आप तो जो भी करते हैं, वही आप को शोभा देता है, फिर अपने भक्त पर क्यों नहीं दया करते ?
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दया न करने योग्य के भी दया करने वाले प्रभो ! अब तो इस प्रकार अनुग्रह कीजिये कि - मुझे अपना जानकर दर्शन दीजिये ।
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हे विश्व स्वामिन् हरे ! मैं आप से प्रार्थना कर रहा हूं, प्रभो ! मुझे दर्शन देकर मुझ से मिलेँ ।
(क्रमशः)

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