शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2020

= ३९३ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग भैरूँ २४(गायन समय प्रात:काल)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३९३ - *ज्ञान प्रलय* । मदन ताल
नांहीं रे हम नांहीं रे, 
सत्य राम सब मांहीं रे ॥टेक॥
नांहीं धरणि अकाशा रे, 
नांहीं पवन प्रकाशा रे ।
नांहीं रवि शशि तारा रे, 
नाँहिं पावक प्रजारा रे ॥१॥
नांहीं पँच पसारा रे, 
नांहीं सब सँसारा रे ।
नहिं काया जीव हमारा रे, 
नहिं बाजी कौतिकहारा रे ॥२॥
नांहीं तरूवर छाया रे, 
नहीं पँखी नहीं माया रे ।
नांहीं गिरिवर वासा रे, 
नांहिं समँद निवासा रे ॥३॥
नांहीं जल थल खँडा रे, 
नांहीं सब ब्रह्मँडा रे ।
नांहीं आदि अनँता रे, 
दादू राम रहँता रे ॥४॥
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ज्ञान प्रलय का स्वरूप दिखा रहे हैं - हम जिस रूप से दिखाई दे रहे हैं, उस रूप से सत्य नहीं हैं । जो हम सब में आत्म स्वरूप राम हैं, वे ही सत्य हैं ।
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पृथ्वी, आकाश, वायु, प्रकाश, प्रकाश के हेतु सूर्य, चन्द्र और तारे सत्य नहीं हैं । भली भाँति जलाने वाली अग्नि सत्य नहीं हैं ।
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वृक्ष, उनकी छाया, पक्षी, श्रेष्ठ पर्वत तथा उनमें निवास, समुद्र और समुद्र में निवास, जल और जल के बीच नाना द्वीप रूप स्थल खण्ड, सब ब्रह्माण्ड, पँच भूतों का फैलाव सब सँसार, काया, हमारा जीवत्व भाव इत्यादिक सँसार रूप खेल और माया सत्य नहीं हैं ।
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जब सँसार रूप खेल सत्य नहीं है, तब उसका कर्त्ता ईश्वर भाव सत्य नहीं है, कारण - वह भी माया उपाधि से ही भासता है । अत: जो आदि - अन्त से रहित अनन्त निरंजन राम हैं, वे ही सत्य रूप से रहते हैं ।
(क्रमशः)

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