शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2020

= *सानी का अंग १२९(१/५)* =

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*साचे को झूठा कहैं, झूठा साच समान ।*
*दादू अचरज देखिया, यहु लोगों का ज्ञान ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*सानी का अंग १२९*
इस अंग में मन में मिली हुई बुरी भावना का परिचय देते हुए कहते हैं उसे निकले बिना श्रेय नहीं होता है ~
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गुरु मुख साँची ना गहै, मन मुख बैठी आनि ।
जन रज्जब सुलझै सु क्यों, हृदय हलाहल१ सानि२ ॥१॥
गुरु के मुख से निकली हुई सत्य बात भी नहीं ग्रहण करता, कारण - उसके मन में मन की इच्छानुकूल बात बैठी हुई है । ऐसा मनुष्य भ्रम फंदे से कैसे सुलझ सकेगा ? उसके हृदय में तो विपरीत भावना रूप महाविष१ मिला२ हुआ है ।
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रज्जब सानि१ शरीर में, कहै और की और ।
पड्या पुकारे धाम में, ले चालैं गृह ठौर ॥२॥
जैसे कोई अपने घर में पड़ा हुआ जोर जोर से कहे मुझे मेरे घर के स्थान में ले चलें वैसे ही मन में तो और बात मिली१ रहती है और कहता कुछ और ही है उसका श्रेय कैसे हो ?
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रज्जब डाली बैठि कर, मूरख काटै मूल ।
सो शठ२ गहिला१ ज्ञान बिन, भीतर भारी भूल ॥३॥
जैसे कोई मूर्ख डाली पर बैठ कर उसी डाल का मूल काटे तो वह अनसमझ१ है, इस क्रिया से नीचे ही पड़ेगा । वैसे ही जो दुष्ट२ जिन गुरुजनों के आश्रय रहता है, उनका ही निन्दादि द्वारा छेदन करता है तो उसके भीतर भारी भूल मिली हुई है, वह ज्ञानहीन है अंत में उसका पतन ही होगा ।
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रज्जब साधू शेष गति१, दोष धरै बहु भूल ।
यथा सानियाँ डाल चढ, मूरख काटै मूल ॥४॥
संत शेष के समान चेष्टा१ वाले हैं अर्थात शेषजी जैसे सबके आधार हैं वैसे ही संत भी सबके हितैसी हैं उनमें जो दोषारोपण करता है तो बहुत भूल है । किन्तु जैसे मूर्ख डाल पर चढकर उसका मूल काटता है, वैसे ही सानियाँ(जिसके मन में बुरे विचार मिले हुये हैं सो) भी संतों के आश्रय रह कर उनकी निन्दा करता है, अत: गिरे ही गा ।
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ज्यों बालक भौंरी१ लई२, सहज खेल को ख्याल३ ।
रज्जब त्योरी४ त्यों फिरी५, सब देखे चकचाल६ ॥५॥
सहज स्वभाव खेलने का विचार३ करके ज्योहिं बालक फिरने१ लगता२ है त्यों ही उसकी दृष्टि४ फिर५ जाती है, तब वह सबका भ्रमण करते हुये देखता है, यह उसी के भ्रमण का दोष है । वैसे ही अपने दोष से दोषी दिखाई देते हैं, दोष देखना अपना ही अपराध६ है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित सानी का अंग १२९ समाप्तः ॥सा. ४०८९॥ 
(क्रमशः)

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