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🌷 #०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु 🌷
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*दादू विषै सुख मांहि खेलतां, काल पहुँच्या आइ ।*
*उपजै विनशै देखतां, यहु जग यों ही जाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ काल का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु*, *विषयी*
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कण्डमुनि के पास नौ सौ सात वर्ष ६ महिना प्रम्लोचा अप्सरा रही थी । एक दिन पूर्व पुण्य से मुनि को कुछ चेत हुआ । वे कुटिया के बाहर जाने लगे । प्रम्लोचा बोली - "कहा जाते हैं ।" मुनि - सूर्य अस्त हो रहा है संध्या करूंगा, देर होने से धर्म लोप होगा ।" प्रम्लोचा - "क्या आज नया सूर्य अस्त हो रहा है, यह तो रोज होता है और दिनों तो आप संध्या नहीं करते थे । मैं आपके पास बहुत वर्षो से रहती हूं । मैंने पहले तो कभी आपको संध्या करते नहीं देखा । मुनि - "तू तो आज प्रात:काल ही आई थी कहां से देखती ।" प्रम्लोचा - "नहीं मुझे आये ९ सौ ७ वर्ष ६ महीने हुये हैं। यह सुन, मुनि ने उसे निकाल दिया ।
विषयासक्त मनुष्य को, समय न जात लखात ।
प्रम्लोचा वर्षो रही, आई कण्डु कह प्रात ॥१४८॥

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