शनिवार, 31 अक्टूबर 2020

= १६० =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 सत्यराम सा 卐 🙏🌷
*झूठा गर्व गुमान तज, तज आपा अभिमान ।*
*दादू दीन गरीब ह्वै, पाया पद निर्वाण ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ जीवित मृतक का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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सन्त ईश्वर सिंह अच्छे विद्वान थे, हृषीकेश की झाड़ी में रहा करते थे । एक चपलमति पंडित ने उनके आश्रम पर जाकर उन्हीं से पूछा - "ईश्वरसिंह कहां है ? वे बोले कहो क्या कार्य है ? पंडित "मुझे उनसे शास्त्रार्थ करना है ।" संत उठे और अपनी पर्ण कुटीर में जाकर, विजय पत्र लिख कर कि - ईश्वरसिंह हारा और पंडित जीते ।" पत्र लाकर पंडित के हाथ में दे दिया । पंडित जान गया कि ये ही ईश्वरसिंह है, और उनके चरणों में पड़ कर बोला - "जैसा सुना वैसा ही पाया । आपकी निर्मानता को धन्यवाद है ।"
संतों में रहता नहीं, लेश मात्र अभिमान ।
विजय पत्र लिख झट दिया, ईश्वरसिंह मतिमान ॥२०४॥

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