शनिवार, 31 अक्टूबर 2020

= ३९४ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग भैरूँ २४(गायन समय प्रात:काल)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३९४ - *मध्य मार्ग निष्पक्ष* । षड्ताल
अलह कहो भावै राम कहो,
डाल तजो सब मूल गहो ॥टेक॥
अलह राम कहि कर्म दहो,
झूठे मारग कहा बहो ॥१॥
साधू संगति तो निबहो,
आइ परै सो शीश सहो ॥२॥
काया कमल दिल लाइ रहो,
अलख अलह दीदार लहो ॥३॥
सतगुरु की सुन सीख अहो,
दादू पहुंचै पार पहो ॥४॥
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३९४ - ३९६ में निष्पक्ष मध्य मार्ग से चलने की प्रेरणा कर रहे हैं - अल्लाह नाम कहो चाहे राम नाम कहो, ये दोनों एक ही ईश्वर के नाम हैं ।
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भेद रूप शाखाओं को त्याग कर सबके हृदय में स्थित परमात्मा की शरण ग्रहण करो । अल्लाह वो राम - नाम कहते हुये ज्ञान प्राप्ति द्वारा अपने कर्म - समूह को जलाओ । सँसार के मिथ्या मार्ग में क्यों जाते हो ?
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सन्तों की संगति करोगे, तब ही तुम्हारा सत्य - मार्ग में निर्वाह हो सकेगा । जो भी प्रारब्धवश शिर पर सुख - दु:ख आ पड़े, उसे सहन करो ।
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शरीर के हृदय - कमल में स्थित प्रभु के स्वरूप में वृत्ति लगावे रहोगे, तो तुम मन इन्द्रियों के अविषय ईश्वर का साक्षात्कार कर सकोगे ।
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जब सद्गुरु - शिक्षा को सम्यक् सुनकर उसके अनुसार साधन करते हुये साँसारिक भावनाओं से पार पहुंचोगे, तब परमानन्द स्वरूप प्रभु को प्राप्त कर सकोगे ।
(क्रमशः)

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