सोमवार, 12 अक्टूबर 2020

*शीश नवावत भक्ति पियारी*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
🌷🙏🇮🇳 *#भक्तमाल* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*जिनके हिरदै हरि बसै, सदा निरंजन नांऊँ ।*
*दादू साचे साध की, मैं बलिहारी जांऊँ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
=================
*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,* 
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान* 
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
.
*जात चले मग देख उभै धर,*
*शीश नवावत भक्ति पियारी ।*
*पूछत गौरि प्रणाम किया किस,*
*दीसत कोउ न यह उचारी ॥*
*बीत हजार गये व्रष१ हू दश,*
*भक्त भयो इक होत तयारी ।*
*भाव भयो परभाव सुन्यो जन,*
*पारवती लगियो रँग भारी ॥२४॥*
एक समय भगवान् शंकर पार्वती जी के साथ भू मंडल में विचर रहे थे । एक दिन मार्ग में चलते चलते शंकर जी ने दो स्थानों में पृथ्वी पर शिर नमाते हुये प्रणाम किया, कारण-उनको भक्ति ही प्यारी है । यह देख कर पार्वती जी ने पूछा- आपने इन दो स्थानों पर प्रणाम किसे किया? इन टीलों पर कोई दीखता भी तो नहीं है । 
शंकर जी ने उत्तर देते हुये कहा- प्रथम स्थान में दश हजार वर्ष१ पहले एक भक्त ने भजन किया था और दूसरे स्थान में दश हजार वर्ष व्यतीत होने पर एक भक्त भजन करेगा । इसलिये दोनों ही स्थान मेरे पूज्य हैं । यह भक्तों का प्रभाव सुनकर पार्वती के मन में भी श्रद्धा उत्पन्न हुई और प्रभु-प्रेम का भारी रंग भी लगा । यह एक छप्पै यहां किसी किसी पुस्तक में मिलता है- 
विधि शंकर मुनि शेष, 
व्यास नारद सनकादिक । 
स्वांभू कमला कपिल, 
मुनि जनक भीष्म धर्मादिक ॥ 
ये द्वादश भक्त नित प्रति सुमरे, 
सिध साधक इनके सखा । 
षट्दर्शन षट्शास्त्र, 
श्रुति स्मृति उचरत मुखा ॥ 
नृप परीक्षित निहचै सुन, 
श्री शुकमुनि कह सु व्योर वत ! 
जन राघव रीझे राम जी, 
पन धर कीजे पाठ नित ॥ 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें