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🌷🙏 *#श्री०रज्जबवाणी* 🙏🌷
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*जैसे कुंजर काम वश, आप बंधाणा आइ ।*
*ऐसे दादू हम भये, क्यों कर निकस्या जाइ ॥*
*जैसे मर्कट जीभ रस, आप बंधाणा अंध ।*
*ऐसे दादू हम भये, क्यों कर छूटै फंध ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*अपलक्षण अपराध का अंग १२८*
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ज्यों कामी गज काम वश, पड्या विघ्न बिच आय ।
त्यों रज्जब हम होय करि, बैठे वपू बंधाय ॥५॥
जैसे कामी हाथी तृणों से छाये हुये खड्डे पर कागज की हथनी को देखकर काम वश हो उस पर पड़ता है तब उसके जीवन में विघ्न आ जाता है और वह अपने शरीर को बँधाकर एक स्थान में बैठा रहता है वैसे ही हम मानव लोग काम वश हो नारी द्वारा बाँधे जाकर उसी के पास बैठे रहते हैं, उसका त्याग नहीं कर सकते, यह हमारा ही अपराध है ।
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ज्यों मरकट मूंठी भरी, बैठ स्वाद की नोक१ ।
यूं रज्जब घर घर फिरे, का शिर देहिं अलोक२ ॥६॥
जैसे वानर स्वाद के अग्र१ भाग पर स्थिर होकर अर्थात स्वाद की तीव्र१ इच्छा में स्थिर होकर पृथ्वी में गड़ी हुई संकड़े मुख के चणों की हंडिया में से दोनों मुठ्ठी एक साथ निकालना चाहता है और निकलती नहीं, इतने में पकड़ने वाला पकड़ लेता है, फिर वह वानर घर घर पर फिरता है किन्तु इसका दोष२ किसको दे, यह तो उसी का अपराध है, वह आगे पीछे दोनों मुठ्ठी निकाल लेता है तो नहीं बँध जाता, वैसे ही मानव जिह्वा के वश में होकर घर घर फिरता है ।
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ज्यों पटछल१ के पिंजरै, स्वारथ सिंह समान२ ।
त्यों रज्जब हम होय कर, आपै आप बँधान ॥७॥
जैसे सिंह पकड़ने के पिंजरे१ में बकरे को बाँधा देख कर खाने के लिये सिंह अपने आप पिंजरे में घुस२ कर बँध जाता है, वैसे ही हम मानव लोग स्वार्थ वश होकर अपने अपने आप घर में बंध रहे हैं ।
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यहु मन बगुला विगति१ बिन, माया का नालेर२ ।
रज्जब चहुंटै३ चूंखतां, छूटण का नहिं फेर४ ॥८॥
जैसे बगला वृक्ष के लगे कच्चे नारियल२ के चूसने का विशेष उपाय१ न जानकर चूंसने लगता है उसकी चोंच नारियल में चिपक३ जाती है फिर४ छूटने का साधन न होने से नहीं छूटता, उसी के लटकता हुआ मर जाता है । वैसे ही मन माया से छूटने का उपाय न जानकर माया के चिपकता है तब छूट नहीं सकता, माया में ही आसक्त रहता है ।
(क्रमशः)

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